
पढ़िए राजदंड की ऐतिहासिक कहानी, 28 मई को PM करेंगे 'सेंगोल' की पुर्नस्थापना
राजदंड अक्सर आपने फिल्मों में एक छड़ीनुमा दंड को देखा होगा लेकिन अब ये हकीकत बनने जा रहा है। तमिल भाषा में इस राजदंड को सेंगोल कहा जाता है। पिछले कुछ दिनों सेंगोल (राजदंड) को लेकर काफ़ी चर्चा हो रही है, आखिरकार यह है क्या? चलिए आज हम आपको बताएंगे इसकी पूरी कहानी।

राजदंड अक्सर आपने फिल्मों में एक छड़ीनुमा दंड को देखा होगा लेकिन अब ये हकीकत बनने जा रहा है। तमिल भाषा में इस राजदंड को सेंगोल कहा जाता है। पिछले कुछ दिनों सेंगोल (राजदंड) को लेकर काफ़ी चर्चा हो रही है, आखिरकार यह है क्या? चलिए आज हम आपको बताएंगे इसकी पूरी कहानी। सेंगोल (राजदंड) का मतलब होता है संपदा से सम्पन। सरकार अब इस ऐतिहासिक राजदंड को संसद में स्थापित करने जा रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बताया कि सेंगोल इससे पहले इलाहाबाद के संग्रहालय में रखा था। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 28 मई को नए संसद भवन का उद्घाटन करेंगे तो इस राजदंड को ऐतिहासिक तौर पर संसद में रखा जाएगा।
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इस मौके पर पीएम मोदी 60 हजार श्रमयोगियों का भी सम्मान करेंगे, जिन्होंने संसद भवन के निर्माण में अपना योगदान दिया है। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने पवित्र सेंगोल को तमिलनाडु से मंगवा कर अंग्रेजों से सेंगोल को स्वीकार किया, इसका तात्पर्य था पारंपरिक तरीके से ये सत्ता हमारे पास आई है। सेंगोल के इतिहास और डीटेल में जाते हैं, सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि सेंगोल जिसको प्राप्त होता है उससे निष्पक्ष और न्यायपूर्ण शासन की उम्मीद की जाती है, यह चोला साम्राज्य से जुड़ा हुआ है, तमिलनाडु के पुजारियों द्वारा इसमें धार्मिक अनुष्ठान किया गया है, आजादी के समय जब इसे नेहरू जी को सौंपा गया था, तब मीडिया ने इसे कवरेज दिया था।

गृह मंत्री ने कहा, 1947 के बाद उसे भुला दिया गया, फिर 1971 में तमिल विद्वान ने इसका जिक्र किया और किताब में भी इसका जिक्र किया गया था, भारत सरकार ने 2021-22 में इसका जिक्र किया है। 96 साल के तमिल विद्वान भी 28 मई को संसद के उद्घाटन के वक्त मौजूद रहेंगे, वे 1947 में नेहरू को सेंगोल सौंपे जाने के वक्त मौजूद थे। यहां पूरी रूप से समर्पित संसद भवन का निर्माण कार्य प्रगति कर रहा है, जो देश के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों के लिए महत्वपूर्ण मंच का कार्य करेगा। इस नए और महानतम संगठन के उद्घाटन समारोह की एक महत्वपूर्ण विशेषता रंग लेगी - भारतीय कला, संस्कृति, और इतिहास का एक प्रतीक, 'राजदंड' कहलाता है। भारतीय कला और संस्कृति की गहरी भूमिका को दिखाते हुए, यह आधारशिला प्रतीत होगी जो देश की अद्वितीय विरासत का प्रतीक है।
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'राजदंड', जो प्राचीनकाल से ही भारतीय सभ्यता का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, संसद भवन के आर्किटेक्चर की मजबूती, गरिमा, और शक्ति को प्रतिष्ठित करेगा। इस राजदंड की कहानी अत्यंत रोचक है। इसे 'सेंगोल' नामक एक उद्यमी और कलाकार ने बनाया है, जिन्होंने अपनी प्रेम से देश की संस्कृति को आदर्श बनाने का संकल्प लिया है। 'सेंगोल', जो अपने असाधारण कौशल और कला के लिए प्रसिद्ध हुआ है, यह सुनिश्चित किया कि राजदंड विश्वस्तरीय मानकों के साथ उपयुक्तता, भावनात्मकता, और आधुनिकता के साथ मेल खाता है। वह इसे भारतीय विरासत के आधार पर बनाने के लिए खुद को समर्पित कर चुका है। इस बड़े समारोह के माध्यम से, 'राजदंड' की महत्त्वपूर्ण कहानी को प्रकट करेंगे, और यह देश के नवीन संसद भवन के बनावटी विज्ञान, आर्किटेक्चर, और कला की गहराई को प्रशंसा करेगा।आधिकारिक उद्घाटन से पहले ही, लोगों के बीच में इस 'राजदंड' की बातें प्रचलित हो रही हैं। यह उच्चारणीय स्मृति व विचारों के द्वारा एक विचार प्रस्तुत करता है, जो भारतीय विरासत के उज्ज्वल चेहरे को प्रतिष्ठित करेगा। इस अद्वितीय समारोह के माध्यम से, हम सब राजदंड की कहानी से परिचित होंगे, जिसका निर्माण सेंगोल ने किया है, और हम देश की संस्कृति, कला, और इतिहास के प्रतीक के रूप में इसका सम्मान करेंगे। यह अद्वितीय संसद भवन उद्घाटन समारोह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक अवसर होगा, जहां सभी लोग संगठन और भारतीय विरासत के इस महान कार्य की प्रशंसा करेंगे।

1947 में भारतीय स्वतंत्रता के बाद, भारत सरकार द्वारा सेंगोल राजदंड का उपयोग नहीं किया गया था, हालांकि, सेंगोल राजदंड अभी भी भारतीय सम्राट की शक्ति और अधिकार का प्रतीक है। यह भारत के समृद्ध इतिहास की याद दिलाता है, और यह देश की आजादी का प्रतीक है।
