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क्या बॉलीवुड बदलेगा अपनी कहानी? फिल्मों में अब तक क्यों गायब हैं पर्यावरण जैसे असल मुद्दे

हमारी फिल्मों की कहानियों में एक बड़ा खालीपन साफ नजर आता है। हम आज भी बड़े पर्दे पर प्रेम कहानियों और सपनों की दुनिया दिखाने में तो माहिर हैं, लेकिन पर्यावरण जैसे असल मुद्दे आज भी हाशिए पर ही हैं।

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AI Generated Image

भारत में फिल्में सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि यह एक ऐसा साझा मंच है जो हर शहर और हर वर्ग के व्यक्ति को एक सूत्र में पिरोता है। सालों से बॉलीवुड हमारे ट्रेंड्स और सोच को दिशा देता आया है। लेकिन आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण के गंभीर संकट से जूझ रही है, तब हमारी फिल्मों की कहानियों में एक बड़ा खालीपन साफ नजर आता है। हम आज भी बड़े पर्दे पर प्रेम कहानियों और सपनों की दुनिया दिखाने में तो माहिर हैं, लेकिन पर्यावरण जैसे असल मुद्दे आज भी हाशिए पर ही हैं।

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अगर ग्लोबल सिनेमा पर नजर डालें, तो वहां तस्वीर काफी अलग है। हॉलीवुड की 'डोंट लुक अप' और 'एन इनकन्वीनिएंट ट्रुथ' जैसी फिल्में यह साबित कर चुकी हैं कि पर्यावरण को पॉप-कल्चर का हिस्सा बनाना कितना जरूरी है। वहां की कहानियों में अब सिर्फ सुपरहीरो ही नहीं, बल्कि संसाधनों की कमी, प्रदूषण और धरती के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी जैसे विषय भी मुख्य धारा का हिस्सा बन रहे हैं।

इसके उलट, बॉलीवुड में पर्यावरण पर आधारित फिल्में अब भी एक दुर्लभ बात है। कभी-कभार पानी की किल्लत या प्रदूषण जैसे मुद्दे पर्दे पर आते तो हैं, लेकिन उन्हें वह 'सेंटर स्टेज' या प्रमुखता नहीं मिलती जिसकी जरूरत है। अक्सर ऐसी फिल्में केवल फिल्म फेस्टिवल्स तक ही सिमट कर रह जाती हैं और उस आम जनता तक नहीं पहुंच पातीं, जहां बॉलीवुड का असली प्रभाव और ताकत है।

यह स्थिति इसलिए भी हैरान करने वाली है क्योंकि आज की नई पीढ़ी, खासकर 'जेन-ज़ी', पर्यावरण को लेकर पहले से कहीं ज्यादा जागरूक है। भीषण गर्मी, अचानक आती बाढ़ और जहरीली हवा अब सिर्फ अखबारों की सुर्खियां नहीं, बल्कि लोगों का रोजमर्रा का अनुभव बन चुकी हैं। लोग अब कचरा प्रबंधन और सस्टेनेबिलिटी जैसे विषयों को गंभीरता से ले रहे हैं।

मुंबई क्लाइमेट वीक जैसे नागरिक-संचालित मंच इसी बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं। इनका मानना है कि पर्यावरण की चर्चा सिर्फ कॉन्फ्रेंस रूम और पॉलिसी तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह हमारी सामाजिक हकीकत और रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बनना चाहिए। अब सवाल सीधा है: क्या बॉलीवुड सिर्फ काल्पनिक दुनिया में ही उलझा रहेगा या असल जिंदगी की इन चुनौतियों को भी दिलचस्प तरीके से पेश करेगा? अगर सिनेमा लोगों की सोच बदल सकता है, तो वक्त आ गया है कि वह आज की चिंताओं को भी अपनी कहानियों का हिस्सा बनाए। उम्मीद है कि बॉलीवुड 'ग्रीन स्टोरीटेलिंग' को कोई बोरिंग लेक्चर समझने के बजाय अपनी तरक्की का अगला बड़ा कदम मानेगा।