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बंगाल में बदला सियासी खेल: ‘7 M फैक्टर’ ने ममता की राह रोकी, BJP 200 सीटों की ओर

पश्चिम बंगाल के चुनावी रुझानों ने सियासी तस्वीर बदल दी है। ममता बनर्जी की पकड़ कमजोर होती दिख रही है और कई अहम फैक्टर इस बदलाव के पीछे बताए जा रहे हैं। आखिर कौन से ऐसे कारण हैं जिन्होंने खेल पलट दिया? जानिए पूरी कहानी, जो आपको चौंका सकती है।

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AI Generated Image

West Bengal Assembly Elections Results 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति में 15 साल तक 'मां, माटी, मानुष' का नारा गूंजता रहा, जिसने ममता बनर्जी को लगातार तीन बार सत्ता दिलाई। लेकिन 2026 के चुनाव में यह फॉर्मूला कड़ी परीक्षा से गुजरता दिख रहा है।

ताजा रुझानों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) करीब 200 सीटों की ओर बढ़ती नजर आ रही है, जबकि All India Trinamool Congress (TMC) लगभग 100 सीटों पर सिमटती दिख रही है। हालांकि, नंदीग्राम से सुवेंदु अधिकारी आगे हैं और भवानीपुर में ममता बनर्जी बढ़त बनाए हुए हैं। चलिए जानते हैं वो सात 'M' जिसने बंगाल में ममता को नाकामयाब बनाया।

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1) महिला

महिलाएं लंबे समय से टीएमसी की चुनावी ताकत रही हैं। ममता बनर्जी सरकार ने लक्ष्मी भंडार और कन्याश्री जैसी योजनाओं के जरिए महिलाओं को आर्थिक सहारा दिया, जिससे उनका भरोसा मजबूत हुआ और चुनावों में इसका फायदा भी मिला।

लेकिन इस बार बीजेपी ने भी इसी मुद्दे पर जोर दिया है। पार्टी ने महिला सुरक्षा को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया और आरजी कर मेडिकल कॉलेज केस को बार-बार उठाया। साथ ही, प्रतीकात्मक कदम उठाते हुए बीजेपी ने पीड़िता की मां को पनिहाटी सीट से उम्मीदवार बनाया।

2) मुस्लिम 

राज्य की करीब 27% मुस्लिम आबादी लंबे समय से ममता बनर्जी की सबसे मजबूत वोट बैंक रही है। 2021 में टीएमसी ने उन 146 सीटों में से 131 सीटें जीती थीं, जहां मुस्लिम आबादी 30 से 90% के बीच थी। इसके पीछे नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और एनआरसी को लेकर फैली चिंता बड़ी वजह रही। 2026 में बीजेपी का यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने का वादा और वोटर लिस्ट से जुड़े मुद्दे एक बार फिर मुस्लिम मतदाताओं को बड़ी संख्या में ममता की ओर खींच सकते हैं।

3) माइग्रेंट

माइग्रेंट यानी प्रवासी मजदूर इस चुनाव में सबसे अनिश्चित लेकिन बेहद अहम भूमिका निभाने वाला वर्ग बनकर उभरे हैं। इस बार बड़ी संख्या में प्रवासी कामगार और प्रोफेशनल्स वोट डालने के लिए लौटे, क्योंकि उन्हें डर था कि अगर वे हिस्सा नहीं लेंगे तो उनका नाम वोटर लिस्ट से हट सकता है या उनकी पहचान पर असर पड़ सकता है। इनकी संख्या और वोटिंग रुझान कई करीबी मुकाबलों का नतीजा तय कर सकते हैं।

4) मतुआ

मतुआ समुदाय, जो पश्चिम बंगाल की आबादी का करीब 17% है और अनुसूचित जाति का एक बड़ा वर्ग माना जाता है, वही समूह है जिसने बीजेपी को राज्य में मुख्य विपक्ष बनने में बड़ी भूमिका दी थी। मौजूदा चुनाव में भी इस समुदाय का समर्थन बीजेपी के लिए बेहद अहम है, खासकर जब मुकाबला काफी करीबी होता दिख रहा है।

5) मशीनरी

बीजेपी ने इस बार पश्चिम बंगाल में अपना चुनावी अभियान पहले से कहीं ज्यादा बड़े स्तर पर चलाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने राज्य में लगातार रैलियां कीं, जबकि लगभग सभी बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी प्रचार में जुटे। वहीं, 'डर के माहौल' को खत्म करने के लिए चुनाव आयोग ने अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था की, जिसमें 2.4 लाख से ज्यादा केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात किए गए, जो 2021 के मुकाबले करीब तीन गुना है। साथ ही बुलेटप्रूफ वाहनों का भी इस्तेमाल हुआ। बीजेपी ने रिकॉर्ड 92% मतदान का श्रेय भी अपने अभियान को दिया है।

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6) मोदी

बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में किसी मुख्यमंत्री चेहरे को आगे नहीं किया और पूरा फोकस 'ब्रांड मोदी' पर रखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान स्थानीय अंदाज अपनाते हुए झालमुड़ी खाई और थंथनिया कालीबाड़ी मंदिर भी गए, ताकि बंगाली मतदाताओं से जुड़ाव मजबूत हो सके। अब देखना है कि ये रणनीति वोट में कितना बदलती है।

7) ममता

वहीं दूसरी ओर ममता बनर्जी की छवि एक जुझारू और जमीन से जुड़ी नेता की रही है, जिसने उन्हें लगातार तीन चुनाव जिताए। लेकिन 2026 का चुनाव उनके लिए सबसे कठिन माना जा रहा है, क्योंकि उन्हें एक तरफ बीजेपी की पूरी ताकत का सामना करना पड़ रहा है और दूसरी तरफ 15 साल की सत्ता के बाद एंटी-इंकम्बेंसी का भी दबाव झेलना पड़ रहा है।