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नेपाल में बाढ़ की तबाही के बाद उठे बड़े सवाल! पांच मिनट पहले भी नहीं मिला अलर्ट, चीन से डेटा शेयरिंग पर नजर

नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बड़े खतरे की ओर ध्यान खींचा है। हजारों लोगों को संभलने का मौका तक नहीं मिला और चेतावनी पांच मिनट पहले भी नहीं पहुंच सकी। आखिर हिमालयी इलाकों की निगरानी में कहां कमी रह गई और चीन से डेटा शेयरिंग पर क्यों सवाल उठ रहे हैं?

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In Short

  • नेपाल की विनाशकारी बाढ़ से कम से कम 800 लोगों की मौत, 3,000 से ज्यादा लोग लापता।
  • अधिकारियों के मुताबिक प्रभावित लोगों को पांच मिनट का भी लीड टाइम नहीं मिला।
  • ऊंचे हिमालयी इलाकों में कमजोर मॉनिटरिंग और सीमित सीमा-पार डेटा शेयरिंग बड़ी चुनौती बनी।

नेपाल में पिछले हफ्ते आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी इलाकों में मौसम की निगरानी और समय पर चेतावनी देने की व्यवस्था में बड़ी कमी उजागर कर दी है। बाढ़ से कम से कम 800 लोगों की मौत हुई है, जबकि 3,000 से ज्यादा लोग लापता हैं। हालात इतने अचानक बिगड़े कि प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित जगह तक पहुंचने का समय भी नहीं मिल पाया।

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ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल के नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के चीफ एग्जीक्यूटिव धरम राज उप्रेती ने बताया कि लोगों को पांच मिनट का भी लीड टाइम नहीं मिला। उनका कहना है कि ऊंचे पहाड़ी इलाकों में वेदर स्टेशन नहीं हैं और सीमा पार मौसम और क्लाइमेट से जुड़े डेटा को साझा करने की व्यवस्था भी सीमित है। उन्होंने इसे नेपाल की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया।

ग्लेशियर ढहने से आई तबाही

26 अगस्त को हुई इस तबाही की शुरुआत एक ग्लेशियर के ढहने से हुई। इसके बाद बर्फ, मिट्टी, चट्टानों और तेज रफ्तार पानी का सैलाब घाटी की ओर बढ़ा और रास्ते में आने वाली बस्तियों को तबाह करता चला गया। सामने आए वीडियो में लोग भागते दिखाई दिए, जबकि पानी और मलबे ने इमारतों, पुलों और बिजली की लाइनों को नुकसान पहुंचाया। पेड़, बड़े पत्थर और गाड़ियां भी पानी में बह गईं।

ऊंचे पहाड़ों में निगरानी कमजोर

उप्रेती के मुताबिक, नेपाल के निचले इलाकों में मॉनिटरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है, लेकिन ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों का बड़ा हिस्सा अब भी ठीक से मॉनिटर नहीं हो पाता। बहुत अधिक ऊंचाई पर वेदर स्टेशन लगाना और उनका रखरखाव करना महंगा और मुश्किल है। इससे तापमान में अचानक बदलाव, पर्माफ्रॉस्ट की स्थिति और नए ग्लेशियल खतरों को समय रहते पहचानना कठिन हो जाता है।

चीन के साथ डेटा शेयरिंग पर सवाल

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने तिब्बती पठार में ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों का तेजी से सर्वे करने का आह्वान किया है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने भी मॉनिटरिंग और अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम मजबूत करने के निर्देश दिए हैं।

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नेपाल में चीनी दूतावास ने कहा कि चीन मौजूदा तकनीक की सीमा के भीतर मॉनिटरिंग, आकलन और विश्लेषण करता रहा है और अहम जानकारी समय पर नेपाल के साथ साझा की गई है। हालांकि, बयान में यह साफ नहीं किया गया कि 26 अगस्त की तबाही से पहले नेपाल को कोई चेतावनी दी गई थी या नहीं।

नुकसान 5 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान

चौधरी ग्रुप के चेयरमैन और नेपाल के एकमात्र अरबपति बिनोद चौधरी के मुताबिक, बाढ़ से नुकसान कम से कम 5 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। पुनर्निर्माण में उतना ही लंबा समय लग सकता है, जितना 2015 के भूकंप के बाद लगा था। उस समय पुनर्निर्माण की प्रक्रिया करीब सात से आठ साल चली थी।

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सैटेलाइट एनालिसिस से संकेत मिला है कि ग्लेशियर के नीचे मौजूद चट्टानी हिस्सा ढहने से यह सिलसिलेवार आपदा शुरू हुई। वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी इस घटना को सीधे क्लाइमेट चेंज से जोड़ना जल्दबाजी होगी। हालांकि, बढ़ता तापमान उस पर्माफ्रॉस्ट को कमजोर कर सकता है, जो ऊंचे पहाड़ी ढलानों को मजबूती से बांधे रखने में मदद करता है।