
रोजाना ₹187 से भी कम में गुजारा कर रहे करोड़ों भारतीय? वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट में सामने आई चौंकाने वाली बात
भारत में अत्यधिक गरीबी तेजी से कम हुई है, लेकिन वर्ल्ड बैंक के नए आंकड़े आर्थिक सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े कर रहे हैं। रोजाना ₹187 का मानक आखिर क्या बताता है? गरीबी मापने के अलग-अलग तरीकों से तस्वीर कैसे बदल जाती है? जानिए पूरी रिपोर्ट का गणित।

In Short
- वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, 2024 में भारत की 57.7% आबादी 8.30 डॉलर प्रतिदिन के गरीबी मानक से नीचे थी।
- भारत में अत्यधिक गरीबी में बड़ी गिरावट आई है, लेकिन करोड़ों परिवार अब भी आर्थिक रूप से कमजोर हैं।
- गरीबी मापने के अलग-अलग मानकों और सर्वे के बदले तरीकों से आंकड़ों में बड़ा अंतर सामने आया है।
भारत में गरीबी कम करने की दिशा में बड़ी कामयाबी मिली है, लेकिन आर्थिक सुरक्षा अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024 में देश की 57.7% आबादी रोजाना 8.30 डॉलर के गरीबी मानक से नीचे थी। यानी देश में आधे से ज्यादा लोग अब भी इस अंतरराष्ट्रीय मानक के हिसाब से आर्थिक रूप से कमजोर हैं।
Markets by Zerodha ने हाल ही में इन आंकड़ों का विश्लेषण शेयर किया है। इसमें बताया गया है कि भारत में अत्यधिक गरीबी तेजी से घटी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि लोगों की आर्थिक परेशानियां पूरी तरह खत्म हो गई हैं।
रोजाना ₹187 का आखिर क्या है मतलब?
वर्ल्ड बैंक अलग-अलग देशों में गरीबी मापने के लिए अलग-अलग मानकों का इस्तेमाल करता है। इनमें 8.30 डॉलर प्रतिदिन का मानक उच्च-मध्यम आय वाले देशों के जीवन स्तर के आधार पर तय किया गया है।
चार्ट के मुताबिक, यह रकम 2021 की परचेजिंग पावर पैरिटी के आधार पर करीब ₹187 प्रतिदिन बैठती है। यह डॉलर से रुपये में सीधा करेंसी कन्वर्जन नहीं है। PPP में अलग-अलग देशों में सामान और सेवाओं की कीमतों का अंतर शामिल होता है।
यह आंकड़ा किसी व्यक्ति की सैलरी नहीं, बल्कि प्रति व्यक्ति रोजाना की आय या खपत को दर्शाता है।
गरीबी के आंकड़ों में इतना बड़ा अंतर क्यों?
वर्ल्ड बैंक के अलग-अलग मानकों के आधार पर भारत में गरीबी की तस्वीर काफी बदल जाती है।
साल 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, रोजाना 3 डॉलर के अत्यधिक गरीबी मानक से नीचे सिर्फ 0.4% आबादी थी। वहीं 4.20 डॉलर के मानक पर यह आंकड़ा 4% और 8.30 डॉलर के मानक पर 57.7% था।
Markets by Zerodha के मुताबिक, वर्ल्ड बैंक के एक अन्य आकलन में भारत की अत्यधिक गरीबी 2011 के 27.1% से घटकर 2024 में 2.6% रह गई। हालांकि, अलग-अलग मानकों और तरीकों के कारण इन आंकड़ों की सीधी तुलना नहीं की जा सकती।

गरीबी मापने के तरीके पर क्यों उठ रहे सवाल?
Markets by Zerodha ने बताया कि भारत में 2014 के बाद से आधिकारिक घरेलू गरीबी रेखा को अपडेट नहीं किया गया है।
इसके अलावा घरेलू खर्च के सर्वे करने का तरीका भी बदला है। पहले एक बार में खर्च की जानकारी ली जाती थी, जबकि नए सर्वे में कई बार जाकर ज्यादा विस्तार से सवाल पूछे जाते हैं।
इससे खर्च की रिपोर्टिंग बढ़ सकती है और गरीबी के आंकड़े कम दिखाई दे सकते हैं। दोनों तरीकों की तुलना करने वाला सर्वे नहीं होने से वास्तविक बदलाव समझना मुश्किल है।
गरीबी से बाहर निकलना क्या आर्थिक सुरक्षा की गारंटी है?
इन आंकड़ों से साफ है कि अत्यधिक गरीबी से बाहर निकलना और आर्थिक रूप से सुरक्षित होना दो अलग बातें हैं।
किसी परिवार की आमदनी गरीबी रेखा से ऊपर होने के बावजूद इलाज, बच्चों की पढ़ाई, मकान और अचानक आने वाले खर्चों को संभालना मुश्किल हो सकता है।
भारत के सामने अब चुनौती सिर्फ गरीबी घटाने की नहीं, बल्कि लोगों की वास्तविक आमदनी बढ़ाने, रोजगार के अवसर बेहतर करने और परिवारों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की भी है।

