चिप्स-बिस्किट से लेकर ब्रेड तक! पैक्ड फूड पर लेबल को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त
पैकेटबंद खाने-पीने की चीजों पर चेतावनी वाले लेबल लगाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से तीखे सवाल पूछे हैं। अदालत ने नए नियम लागू करने में लगने वाले समय पर नाराजगी जताई है। वहीं, फूड इंडस्ट्री ने प्रस्तावित चेतावनी चिह्न और उसके मानकों को लेकर अपनी चिंताएं रखी हैं। आखिर ग्राहकों और कंपनियों पर इसका क्या असर पड़ सकता है? जानिए पूरा मामला।

In Short
- सुप्रीम कोर्ट ने फूड चेतावनी लेबल लागू करने में देरी पर सवाल उठाए।
- ज्यादा चीनी, नमक और फैट वाले उत्पादों पर लाल चेतावनी चिह्न लगाने का प्रस्ताव है।
- - फूड इंडस्ट्री ने लाल रंग और चेतावनी तय करने के मानकों पर चिंता जताई।
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में पैकेटबंद खाने-पीने की चीजों पर चेतावनी वाले लेबल लगाने में हो रही देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से सवाल किए हैं। सोमवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि जब मामला लोगों की सेहत से जुड़ा है, तो नए नियम लागू करने से पहले दोबारा सलाह-मशविरा करने में इतना समय क्यों लगाया जा रहा है?
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान जस्टिस जे. बी. पारदीवाला ने पूछा, 'जब हमें स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों की चिंता है, तो आप इतना समय क्यों बर्बाद करना चाहते हैं?' उन्होंने यह भी सवाल किया कि पिछले चार वर्षों में क्या किया गया और अब दोबारा लोगों की आपत्तियां क्यों मांगी जा रही हैं।
अदालत ने कहा कि वह इस मामले में जल्द अंतिम आदेश जारी करेगी।
क्या है सरकार का नया प्रस्ताव?
सरकार ने ज्यादा नमक, चीनी और फैट वाले पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर लाल रंग के षट्कोणीय चेतावनी चिह्न लगाने का प्रस्ताव दिया है। इसका मकसद ग्राहकों को खरीदारी के समय ही उत्पाद में मौजूद इन चीजों की अधिक मात्रा के बारे में जानकारी देना है।
पिछले सप्ताह खाद्य नियामक ने बताया था कि नए नियमों की अधिसूचना और सार्वजनिक सलाह-मशविरे में चार महीने लगेंगे। इसके बाद इन्हें लागू करने के लिए एक साल का अतिरिक्त समय चाहिए होगा।
बच्चों की सेहत पर भी फोकस
भारत में स्कूलों और उनके आसपास जंक फूड की बिक्री पर रोक लगाने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं।
मोटापे की बढ़ती समस्या भी चिंता का विषय है। मेडिकल जर्नल द लैंसेट की एक स्टडी के मुताबिक, भारत में 2021 में करीब 18 करोड़ वयस्क अधिक वजन या मोटापे से प्रभावित थे। यह संख्या 2050 तक 45 करोड़ पहुंचने का अनुमान है।
फूड कंपनियों को किस बात पर आपत्ति है?
ऑल इंडिया फूड प्रोसेसर्स एसोसिएशन ने अदालत में कहा कि वह पैकेट के सामने चेतावनी वाले लेबल लगाने के खिलाफ नहीं है। हालांकि, उसका कहना है कि लाल रंग का नया चिह्न ग्राहकों को भ्रमित कर सकता है, क्योंकि भारत में लाल निशान का इस्तेमाल नॉन-वेज उत्पादों की पहचान के लिए भी होता है।
एसोसिएशन ने यह भी मांग की कि चेतावनी तय करते समय प्रति 100 ग्राम के बजाय एक बार में खाई जाने वाली मात्रा पर विचार किया जाए। उसका कहना है कि अलग-अलग खाद्य पदार्थ अलग-अलग मात्रा में खाए जाते हैं।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के अंतिम आदेश का इंतजार है। नए चेतावनी लेबल अभी अनिवार्य नहीं हुए हैं।
