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SMARR रियल्टी मामला: जांच, अदालत की निगरानी और रियल एस्टेट सेक्टर पर असर

आरोप है कि कंपनी ने एक बेहद जटिल कॉरपोरेट ढांचा तैयार किया और वित्तीय लेन-देनों की ऐसी कड़ियां बनाईं, जिससे पैसे के असली स्रोत को छिपाया जा सके। फिलहाल यह पूरा मामला प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की जांच के दायरे में है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत के रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। जांच एजेंसियों के रडार पर इस बार SMARR Realty है, जो मनी लॉन्ड्रिंग के गंभीर आरोपों का सामना कर रही है। ईटी हिंदी की एक रिपोर्ट के मुताबिक आरोप है कि कंपनी ने एक बेहद जटिल कॉरपोरेट ढांचा तैयार किया और वित्तीय लेन-देनों की ऐसी कड़ियां बनाईं, जिससे पैसे के असली स्रोत को छिपाया जा सके। फिलहाल यह पूरा मामला प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की जांच के दायरे में है।

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ईटी की रिपोर्ट के अनुसार शुरुआती जांच में लगभग 19 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेन-देन का खुलासा हुआ है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि यह तो सिर्फ शुरुआत है। अगर इस पूरे नेटवर्क की गहराई से पड़ताल की जाए, तो लेन-देन का असली आंकड़ा काफी बड़ा हो सकता है।

आरोप है कि इन पैसों को शेयर प्रीमियम, इंटर-कॉरपोरेट ट्रांसफर और स्ट्रक्चर्ड ट्रांजैक्शन के जरिए कई कंपनियों में घुमाया गया। जांच एजेंसियां अब इस 'मनी ट्रेल' के हर पड़ाव को खंगाल रही हैं ताकि यह पता चल सके कि पैसा असल में कहां से निकला और अंतिम रूप से कहां पहुंचा।

नाम बदलने के पीछे की स्ट्रैटेजी पर सवाल

इस मामले में एक दिलचस्प मोड़ कंपनी के कॉरपोरेट नाम और ढांचे में हुए बदलावों को लेकर आया है। जांच एजेंसियां इस बात की पड़ताल कर रही हैं कि ये बदलाव सामान्य व्यापारिक प्रक्रिया का हिस्सा थे या फिर फंड मूवमेंट के निशानों को मिटाने की कोई सोची-समझी रणनीति।

रियल एस्टेट सेक्टर में अक्सर नई इकाइयां बनाई जाती हैं, लेकिन जब इन बदलावों के साथ भारी-भरकम राशि एक खाते से दूसरे खाते में भेजी जाती है, तो संदेह बढ़ जाता है। यही कारण है कि एजेंसियां अब कंपनी के पूरे कॉरपोरेट नेटवर्क के इतिहास को खंगाल रही हैं।

हाई कोर्ट की निगरानी

कलकत्ता हाई कोर्ट का इस मामले में सीधा हस्तक्षेप किया है। अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया है कि जांच एजेंसियां बिना उसकी अनुमति के कोई भी अंतिम रिपोर्ट दाखिल नहीं कर सकतीं। अदालत की यह सक्रियता दिखाती है कि मामला केवल तकनीकी गड़बड़ी का नहीं, बल्कि व्यवस्थागत खामियों से जुड़ा हो सकता है।