अमेरिकी राहत के बीच रिलायंस इंडस्ट्रीज ने 2019 के बाद पहली बार ईरान से खरीदा 50 लाख बैरल कच्चा तेल
रिपोर्ट के अनुसार, इस तेल की कीमत ICE ब्रेंट फ्यूचर्स से करीब 7 डॉलर प्रति बैरल प्रीमियम पर तय हुई है। हालांकि, डिलीवरी की टाइमलाइन अभी साफ नहीं है।

In Short
- रिलायंस ने 7 साल बाद ईरान से 50 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा, अमेरिकी राहत का फायदा उठाया।
- यह डील भारत की तेल सप्लाई को विविध बनाने (diversification) की रणनीति का संकेत देती है।
- हालांकि, जियोपॉलिटिकल जोखिम और प्रतिबंधों की अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है।
मुकेश अंबानी की Reliance Industries Limited (RIL) ने अमेरिकी प्रतिबंधों में अस्थायी राहत मिलने के कुछ ही दिनों बाद बड़ा कदम उठाया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, आरआईएल ने ईरान से 50 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा है। यह खरीद National Iranian Oil Company से की गई बताई जा रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस तेल की कीमत ICE ब्रेंट फ्यूचर्स से करीब 7 डॉलर प्रति बैरल प्रीमियम पर तय हुई है। हालांकि, डिलीवरी की टाइमलाइन अभी साफ नहीं है।
2019 के बाद पहली बार सौदा
यह डील इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत ने आखिरी बार मई 2019 में ईरान से तेल आयात किया था। उस समय अमेरिका ने तेहरान पर दोबारा सख्त प्रतिबंध लगाए थे, जिसके बाद भारतीय कंपनियों ने तेल खरीदना बंद कर दिया था। अब करीब 7 साल बाद रिलायंस की यह खरीद भारत की ऊर्जा रणनीति में बदलाव का संकेत है।
30 दिन की सीमित राहत ने खोला मौका
पिछले हफ्ते अमेरिकी प्रशासन ने 30 दिन की सीमित छूट दी थी, जिसके तहत 20 मार्च तक लोड हो चुके ईरानी तेल को 19 अप्रैल तक खरीदा और डिलीवर किया जा सकता है। इसी छोटे विंडो का फायदा उठाकर यह डील किया गया। हालांकि, मार्केट एक्सपर्ट्स के मुताबिक यह राहत स्थायी नहीं है और इससे सप्लाई में तुरंत बड़ा बदलाव नहीं आएगा।
रूस के बाद अब ईरान पर नजर
हाल के महीनों में भारतीय रिफाइनर सस्ते ऑप्शन तलाश रहे हैं। इसी कड़ी में इस महीने भारत ने रूस से 4 करोड़ बैरल से ज्यादा कच्चा तेल खरीदा है। अब ईरान से यह डील बताती है कि कंपनियां सप्लाई डाइवर्सिफिकेशन पर फोकस बढ़ा रही हैं।
चीन अब भी सबसे बड़ा खरीदार
डेटा फर्म Kpler के मुताबिक, ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार अभी भी चीन है। फरवरी में चीन ने 1.57 मिलियन बैरल प्रतिदिन और मार्च में अब तक 1.48 मिलियन बैरल प्रतिदिन आयात किया है।
फर्म ने कहा कि पेमेंट, शिपिंग और भरोसे से जुड़े जोखिम नए खरीदारों को दूर रख सकते हैं, जिससे ईरानी तेल का प्रवाह फिलहाल सीमित ही रहेगा।
आगे क्या?
रिलायंस की यह खरीद संकेत देती है कि अगर प्रतिबंधों में ढील मिलती है तो भारतीय कंपनियां फिर से ईरानी तेल की ओर लौट सकती हैं। हालांकि, जियोपॉलिटिकल जोखिम अभी भी बड़े फैक्टर बने हुए हैं।

