
रक्षाबंधन पर तिलक के ऊपर क्यों लगाए जाते हैं चावल? जानिए अक्षत की परंपरा और धार्मिक महत्व
रक्षाबंधन पर तिलक और राखी की रस्म तो सभी जानते हैं, लेकिन माथे पर लगाए जाने वाले चावल यानी अक्षत का महत्व बहुत खास माना जाता है। आखिर तिलक के ऊपर चावल लगाने की परंपरा क्यों है और इससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं क्या कहती हैं? जानिए पूरी जानकारी।

In Short
- रक्षाबंधन पर तिलक के साथ चावल यानी अक्षत लगाने की परंपरा का धार्मिक महत्व बताया गया है।
- माथे पर तिलक के ऊपर चावल लगाने को शुभता, सकारात्मक ऊर्जा और आशीर्वाद से जोड़कर देखा जाता है।
- जानिए अक्षत की परंपरा, तिलक का महत्व और राखी बांधने की रस्म से जुड़ी मान्यताएं।
रक्षाबंधन भाई-बहन के रिश्ते और उनके बीच प्रेम का खास त्योहार है। इस साल रक्षाबंधन 28 अगस्त शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन बहनें भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं और उससे पहले उनके माथे पर तिलक लगाती हैं। तिलक के साथ चावल यानी अक्षत लगाने की भी परंपरा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि तिलक के ऊपर चावल क्यों लगाए जाते हैं और इसका क्या महत्व माना जाता है? आइए जानते हैं इससे जुड़ी मान्यताएं।
रक्षाबंधन पर तिलक लगाने की क्या है मान्यता ?
रक्षाबंधन पर राखी बांधने से पहले भाई के माथे पर तिलक लगाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। हिंदू धर्म और शास्त्रों में इसे शुभ माना गया है। मान्यता के अनुसार तिलक भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है।
भौहों के बीच वाले हिस्से में तिलक लगाया जाता है। इस स्थान को ज्ञान और चेतना का केंद्र माना गया है। मान्यता है कि इस जगह तिलक लगाने से एकाग्रता और स्मरण शक्ति बेहतर हो सकती है। इसके साथ ही जीवन में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ने की भी मान्यता है।

तिलक के साथ चावल क्यों लगाए जाते हैं?
रक्षाबंधन पर बहनें केवल तिलक ही नहीं लगातीं बल्कि उसके ऊपर अक्षत यानी चावल भी लगाती हैं। ज्योतिष से जुड़ी मान्यताओं के मुताबिक तिलक के साथ चावल लगाने से आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।
मान्यता है कि माथे पर लगाया गया अक्षत जीवन में ग्रहों की स्थिति को संतुलित करने से भी जुड़ा है। अलग-अलग ग्रहों को अलग गुणों ऊर्जा और देवी-देवताओं से जोड़ा जाता है। इसी कारण तिलक के साथ चावल लगाने की परंपरा को शुभ माना जाता है।
देवी-देवताओं के आशीर्वाद से भी जुड़ी है मान्यता
तिलक के ऊपर चावल लगाने को देवी-देवताओं के आशीर्वाद से भी जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि इससे सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और ग्रहों से जुड़ी ऊर्जा संतुलित रहती है।
इसी वजह से रक्षाबंधन की पूजा और राखी बांधने की प्रक्रिया में तिलक और अक्षत दोनों को खास जगह दी जाती है। पहले भाई के माथे पर तिलक लगाया जाता है और उसके बाद उस तिलक पर चावल लगाए जाते हैं। इसके बाद बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई अपनी बहन को रक्षा का वचन और उपहार देता है।

