
ग्लेशियर, पहाड़ और तेज बहाव... आखिर क्यों रसुवा में बार-बार मचती है बाढ़ की तबाही
नेपाल का रसुवा जिला बार-बार आने वाली बाढ़ और फ्लैश फ्लड का सामना कर रहा है। पिछले पांच साल में यहां पांच बड़ी बाढ़ आ चुकी हैं। ऊंचे पहाड़, तेजी से पिघलते ग्लेशियर और संकरी भौगोलिक स्थिति इस इलाके को लगातार खतरे में बनाए हुए हैं।

In Short
- 2022 से 2026 के बीच नेपाल के रसुवा जिले में कम से कम पांच बड़ी बाढ़ आ चुकी हैं।
- ऊंचे पहाड़, तेजी से पिघलते ग्लेशियर और पानी के तेज बहाव से यहां तबाही का खतरा बढ़ जाता है।
- ग्लेशियर झील टूटने से अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है, इसलिए पहले से चेतावनी और सुरक्षित निर्माण जरूरी है।
नेपाल का रसुवा जिला एक बार फिर बाढ़ की चपेट में है। 26 अगस्त को यहां अचानक आई बाढ़ ने भारी नुकसान पहुंचाया। लेकिन रसुवा के लिए यह पहली ऐसी घटना नहीं है। पिछले कुछ सालों में यह हिमालयी इलाका बार-बार बाढ़ और फ्लैश फ्लड का सामना कर चुका है।
नेपाल की नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के आंकड़ों के मुताबिक, 2022 से 2026 के बीच रसुवा में कम से कम पांच बड़ी बाढ़ आ चुकी हैं। साल 2025 में आई दो बड़ी बाढ़ में कम से कम 20 लोगों की मौत हुई थी।
पहाड़ों और ग्लेशियरों के बीच फंसा है रसुवा
रसुवा नेपाल-चीन सीमा के पास ऊंचे पहाड़ों में बसा हुआ है। यहां ऊपर पहाड़ों और ग्लेशियरों से पानी तेजी से नीचे आता है। लेकिन पहाड़ों के बीच समतल और खुली जमीन काफी कम है।

इस वजह से पानी को फैलने या अपनी रफ्तार कम करने की जगह नहीं मिलती। तेज बहाव वाला पानी सीधे गांवों, सड़कों और पुलों को नुकसान पहुंचाता है।
तिमुरे, रसुवागढ़ी और स्याफ्रुबेसी जैसे इलाके पहाड़ों के बीच बसे हैं, जहां समतल जमीन कम होने के कारण बाढ़ का असर ज्यादा देखने को मिलता है।
भोटेकोशी और ग्लेशियर झीलों से बढ़ा खतरा
रसुवा में पहले भी कई बार अचानक बाढ़ की घटनाएं हो चुकी हैं। साल 2023 में भोटेकोशी नदी का पानी दो बार अचानक बढ़ा था। पहली घटना 3 जून और दूसरी 13 जुलाई को हुई थी।
इसके बाद 25 अगस्त 2024 को केरुंग नदी की एक छोटी धारा से बाढ़ आई। इन घटनाओं में समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया, इसलिए किसी की मौत नहीं हुई।
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लेकिन साल 2025 में हालात ज्यादा गंभीर रहे। 8 और 30 जुलाई को ल्हेंदे-भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ ने भारी नुकसान पहुंचाया। 8 जुलाई की बाढ़ का कारण तिब्बत के प्योरपु ग्लेशियर के पास बनी एक झील से अचानक पानी का निकलना बताया गया।
ग्लेशियर पिघलने से बढ़ रहा खतरा
हिमालय में बढ़ता तापमान भी इस खतरे को बढ़ा रहा है। ICIMOD की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2000 के बाद ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार करीब दोगुनी हो गई है।
पिछले 50 साल में करीब 89 फीसदी ग्लेशियरों ने बर्फ खोई है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से उनके पास बनी झीलों में पानी बढ़ सकता है। अगर इन झीलों की दीवार टूटती है तो अचानक बहुत ज्यादा पानी नीचे की ओर आ सकता है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है।

