पीएम मोदी की अपील ने याद दिलाया 1962 का दौर! तब नेहरू ने मांगा था सोना, इंदिरा गांधी ने दान किए थे गहने
पीएम मोदी की हालिया अपील ने देश को इतिहास के एक ऐसे दौर की याद दिला दी, जब मुश्किल समय में लोगों ने खुलकर योगदान दिया था। उस वक्त देश की बड़ी हस्तियों ने भी मिसाल पेश की थी। आखिर क्या था वह दौर और क्यों फिर चर्चा में है, जानिए पूरी कहानी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते रविवार को लोगों से एक साल तक सोने की खरीद टालने, विदेश यात्राएं कम करने, ईंधन की बचत करने और स्वदेशी प्रोडक्ट अपनाने की अपील की। पश्चिम एशिया संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास सप्लाई बाधित होने से कच्चे तेल और फर्टिलाइजर की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के बीच सरकार विदेशी मुद्रा बचाने की कोशिश में जुटी है।
भारत का गोल्ड इम्पोर्ट 2025-26 में 24 फीसदी बढ़कर रिकॉर्ड 71.98 अरब डॉलर यानी करीब 6.77 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। ऐसे में मोदी की अपील को सरकार विदेशी मुद्रा पर दबाव कम करने की कोशिश के तौर पर देख रही है।
जब नेहरू ने देशवासियों से मांगा था सोना
देश में संकट के समय त्याग की अपील पहली बार नहीं हुई है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नागरिकों से नेशनल डिफेंस फंड के लिए सोना और धन दान करने की अपील की थी।
सरकार ने उस समय देशभर में अभियान चलाया था। अपील में कहा गया था कि चीन ने युद्ध रुकने के बाद भी लद्दाख के 14 हजार वर्ग मील इलाके पर कब्जा बनाए रखा है और भारत को किसी भी नए हमले के लिए तैयार रहना होगा। उस अभियान की सबसे चर्चित पंक्तियों में एक थी - आज सोने के कंगनों का क्या फायदा, अगर कल हम लोहे की जंजीरों में जकड़े हों?
इंदिरा गांधी ने भी दान किए थे गहने
बाद में प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी ने भी 1962 युद्ध के दौरान राष्ट्रीय राहत कोष में 367 ग्राम सोने के गहने दान किए थे। रक्षा मंत्रालय की 2009 की एक कॉफी टेबल बुक में इसका जिक्र किया गया था।
1991 में गिरवी रखना पड़ा था सोना
करीब तीन दशक बाद भारत को एक और बड़े संकट में सोने का सहारा लेना पड़ा। 1991 में विदेशी मुद्रा भंडार इतनी तेजी से घटा कि देश के पास सिर्फ तीन हफ्ते के आयात लायक डॉलर बचे थे।
इराक द्वारा कुवैत पर हमले के बाद तेल कीमतों में उछाल आया और भारत का भुगतान संतुलन संकट गहरा गया। उस समय सरकार ने पहले 20 टन सोना गिरवी रखकर 20 करोड़ डॉलर जुटाए। बाद में जुलाई 1991 में 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड भेजकर 40.5 करोड़ डॉलर का कर्ज लिया गया। यह कदम भारत को डिफॉल्ट से बचाने में अहम साबित हुआ। बाद में प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में आर्थिक सुधारों का रास्ता खुला।

