scorecardresearch

18 की उम्र में आया था जिंदगी का सबसे बुरा दौर, 7 दिन भूखा रहकर इस CEO ने क्या सीखा?

मुंबई के स्टार्टअप फाउंडर अभिषेक अग्रवाल ने 18 साल की उम्र का वह दौर याद किया जब उनके पास खाने तक के पैसे नहीं थे। सात दिनों तक ब्रेड और पानी के सहारे रहने के इस अनुभव ने उन्हें सिर्फ आर्थिक तंगी का सामना करना नहीं सिखाया, बल्कि मुश्किल हालात में खुद पर भरोसा करना भी सिखाया।

Advertisement
मुंबई के एक फाउंडर की जिंदगी के सबसे मुश्किल दौर से जुड़ी LinkedIn पोस्ट वायरल हो गई है। (फोटो: LinkedIn/Abhishek Agarwal)
मुंबई के एक फाउंडर की जिंदगी के सबसे मुश्किल दौर से जुड़ी LinkedIn पोस्ट वायरल हो गई है। (फोटो: LinkedIn/Abhishek Agarwal)

In Short

  • 18 साल की उम्र में अभिषेक अग्रवाल के पास खाना खरीदने तक के पैसे नहीं थे
  • सात दिनों तक उन्होंने ब्रेड खाकर और पानी पीकर गुजारा किया
  • इस मुश्किल दौर ने उन्हें जोखिम और असफलता से न डरने की हिम्मत दी

मुंबई के स्टार्टअप फाउंडर अभिषेक अग्रवाल ने अपनी जिंदगी के एक बेहद मुश्किल दौर को याद किया है। उन्होंने बताया कि 18 साल की उम्र में एक समय ऐसा आया था जब उनके पास खाना खरीदने तक के पैसे नहीं थे। करीब सात दिनों तक उन्होंने सिर्फ ब्रेड खाई और पानी पिया।

advertisement

अग्रवाल ने अपने लिंक्डइन पोस्ट में इस अनुभव को साझा करते हुए बताया कि वह उनकी जिंदगी के सबसे मुश्किल दौर में से एक था। हालांकि, आज पीछे मुड़कर देखने पर उन्हें लगता है कि यही दौर उनके लिए सबसे जरूरी सीख लेकर आया।

18 की उम्र में खाने के लिए भी पैसे नहीं थे

अग्रवाल ने बताया कि जब वह 18 साल के थे तब वह आर्थिक रूप से इतने मुश्किल दौर में थे कि शिक्षा और खाने तक के लिए पैसे नहीं थे। उन्होंने साफ किया कि वह ऐसी स्थिति की बात नहीं कर रहे हैं जहां किसी छुट्टी के लिए पैसे कम पड़ जाएं या किसी चीज को खरीदने के लिए अगले महीने की सैलरी का इंतजार करना पड़े।

उनके मुताबिक, वह वास्तव में पूरी तरह आर्थिक तंगी में थे। खाने के लिए भी पैसे नहीं थे। ऐसे में सात दिनों तक उन्होंने ब्रेड खाकर और पानी पीकर गुजारा किया।

भूख से ज्यादा याद रही बेबसी

अग्रवाल ने कहा कि उन्हें उस समय की भूख आज भी याद है, लेकिन उससे ज्यादा उस वक्त की बेबसी उनके साथ रह गई।

उनके मुताबिक, उस समय उन्हें यह पता चला कि जब इंसान के पास लगभग कुछ भी नहीं बचता है तो कैसा महसूस होता है। लेकिन इसी अनुभव से उन्हें एक और बड़ी बात समझ आई कि वह उस स्थिति से भी निकल सकते हैं।

उन्होंने कहा कि उन्हें यह एहसास हुआ कि वह उस मुश्किल दौर को झेल सकते हैं और उससे बचकर निकल सकते हैं।

यही एहसास बाद में उनकी जिंदगी में कई बार काम आया। कारोबार में असफलता, पैसों की अनिश्चितता, रिजेक्शन और योजनाओं के नाकाम होने जैसी परिस्थितियों के बीच उन्हें यह भरोसा रहा कि इससे भी मुश्किल समय वह पहले देख चुके हैं।

पोस्ट का मुख्य संदेश:
“मैं 18 साल की उम्र में बेहद गरीब था। सात दिनों तक मैंने ब्रेड खाई और पानी पिया। मुझे उस समय की भूख याद है, लेकिन उससे ज्यादा उस बेबसी की याद है। फिर मुझे एक ऐसी बात पता चली जिसे मैं पहले नहीं जानता था मैं इस स्थिति से भी बच सकता हूं।”

advertisement

गरीबी को रोमांटिक बनाने की बात नहीं

अग्रवाल का कहना है कि हर व्यक्ति को जिंदगी में ऐसा कोई दौर मिलना जरूरी हो सकता है जहां वह अपनी सीमाओं को समझ सके। लेकिन उन्होंने गरीबी और मुश्किलों को किसी तरह की महान चीज बताने से साफ इनकार किया।

उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि गरीबी कोई अच्छी या महान चीज है। गरीबी महान नहीं है। न ही सिर्फ तकलीफ झेलने से इंसान अपने आप मजबूत बन जाता है।

उनके मुताबिक, असली बात यह है कि जब इंसान बेहद मुश्किल हालात से गुजरकर बाहर निकलता है तो उसके अंदर एक अलग तरह का आत्मविश्वास पैदा होता है।

मुश्किल दौर से मिली हिम्मत

अग्रवाल के अनुसार, जिंदगी के सबसे निचले दौर तक पहुंचने और वहां से वापस आने का अनुभव एक खास तरह की हिम्मत देता है। यही हिम्मत बाद में जोखिम उठाने और असफलता का सामना करने में मदद करती है।

उनके सात दिनों का अनुभव इसलिए सिर्फ भूख की कहानी नहीं है। यह उस एहसास की कहानी है कि जब हालात बिल्कुल खिलाफ हों तब भी इंसान उन्हें झेल सकता है। उनके लिए उस दौर की सबसे बड़ी सीख यही रही कि मुश्किल समय आपको आपकी अपनी क्षमता का एहसास करा सकता है।

advertisement