scorecardresearch

ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार ने बढ़ाई चिंता, हिमालय में बदलते हालात का असर कहां तक जाएगा?

हिमालय में तेजी से बदलते हालात ने नई चिंता खड़ी कर दी है। ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ने से आने वाले समय में पानी और पर्यावरण पर असर पड़ सकता है। नई स्टडी में सामने आए इन संकेतों ने विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है। पूरी रिपोर्ट में जानिए क्या है खतरा।

Advertisement

In Short

  • हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघलने से बढ़ा जल सुरक्षा का खतरा
  • स्टडी में कई ग्लेशियर झीलों को बताया गया हाई रिस्क वाली श्रेणी में
  • हिमालय क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों की आजीविका के लिए अहम

हिमालय क्षेत्र एक बड़े खतरे की ओर बढ़ रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, एक नई स्टडी में खुलासा हुआ है कि हिमालय के ग्लेशियर एक दशक पहले की तुलना में अब ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं। ग्लेशियरों में हो रहे इस बदलाव से आने वाले समय में पानी की उपलब्धता पर बड़ा असर पड़ सकता है।

advertisement

स्टडी के मुताबिक, हिमालय क्षेत्र मध्य सदी तक "पीक वॉटर" की स्थिति के करीब पहुंच सकता है। इसका मतलब है कि एक समय के बाद नदियों में पानी का बहाव बढ़ने के बजाय कम होने लगेगा। इससे इस पूरे क्षेत्र में पानी की सुरक्षा को लेकर गंभीर चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। 

ग्लेशियर टूटने से बढ़ा खतरा

अगस्त के आखिर में नेपाल-तिब्बत सीमा के पास एक हिमालयी ग्लेशियर के टूटने की घटना सामने आई थी। इसके बाद कई जगहों पर भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी स्थिति बनी। नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र में इस घटना के बाद कम से कम 1,300 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि 5,300 से ज्यादा लोग लापता बताए गए हैं।

स्टडी में कहा गया है कि ग्लेशियर पीछे हटने के साथ कई अस्थिर ग्लेशियर झीलें बन रही हैं। ये झीलें ढीली चट्टानों और बर्फ से बनी प्राकृतिक दीवारों के सहारे टिकी हुई हैं। इनके टूटने से नीचे की घाटियों में रहने वाले लाखों लोगों पर खतरा बढ़ सकता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

हजारों ग्लेशियर, लेकिन निगरानी सीमित

यह स्टडी Systemiq, Integrated Mountain Initiative, International Centre for Integrated Mountain Development और भारत के G.B. Pant National Institute of Himalayan Environment के सहयोग से तैयार की गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में करीब 40,000 ग्लेशियर मौजूद हैं, लेकिन इनमें से केवल 21 ग्लेशियरों की जमीन पर निगरानी की जा रही है। यह पर्वतीय क्षेत्र अफगानिस्तान से लेकर म्यांमार तक आठ देशों में फैला हुआ है।

भारत में करीब 200 ग्लेशियर झीलों को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में पहचाना गया है। इनमें से 56 झीलों को "बहुत अधिक जोखिम" वाली श्रेणी में रखा गया है, जिससे नीचे रहने वाली आबादी पर खतरा बना हुआ है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर भी असर

रिपोर्ट के अनुसार, हिमालय क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र भारत के GDP में 20% से ज्यादा का योगदान देता है और करोड़ों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है।

हालांकि, भारत के कुल भूभाग का करीब 18% हिस्सा होने के बावजूद हिमालय क्षेत्र देश की लगभग 35% प्राकृतिक आपदाओं का हिस्सा बनता है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और जल प्रवाह में बदलाव से आने वाले समय में पर्यावरण और लोगों की आजीविका दोनों पर असर पड़ सकता है।

advertisement