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दिल्ली में क्यों उतारे जा रहे हैं 500 तिरंगे? जानिए इसके पीछे की बड़ी वजह

दिल्ली में खराब मौसम ने ऐसा असर दिखाया है कि प्रशासन को एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लेना पड़ा है। राजधानी के कई प्रमुख इलाकों में दिखने वाले विशाल तिरंगों को लेकर नई तैयारी शुरू हो गई है। आखिर क्यों उठाया गया यह कदम और इसका क्या असर होगा? जानने के लिए पढ़ें पूरी खबर।

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दिल्ली भर में लगभग 500 झंडे के खंभे लगाए गए हैं, जिनकी ऊंचाई प्रत्येक 115 फीट है।
आंधी-तूफान के बाद दिल्ली में उतारे गए 500 तिरंगे

दिल्ली में पिछले कुछ दिनों से मौसम लगातार करवट बदल रहा है। तेज आंधी, धूल भरी हवाओं और बारिश ने लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। अब इसका असर राजधानी में लगाए गए बड़े-बड़े तिरंगे झंडों पर भी देखने को मिल रहा है।

दरअसल दिल्ली सरकार के लोक निर्माण विभाग (PWD) ने राजधानी में आंधी-तूफान, बारिश के मौसम के चलते शहर भर में लगे करीब 500 विशाल तिरंगों को फिलहाल उतारने का फैसला किया है। पिछले दिनों कई जगहों पर तेज हवाओं और आंधी-तूफान के कारण तिरंगों को नुकसान पहुंचा है। 

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PWD के अधिकारियों का कहना है कि मौसम विभाग की आंधी-तूफान संबंधी चेतावनी खत्म होने के बाद ही इन झंडों को दोबारा फहराया जाएगा। विभाग नहीं चाहता कि बाकी तिरंगों को भी नुकसान पहुंचे, इसलिए एहतियात के तौर पर सभी झंडे अस्थायी रूप से उतारे जा रहे हैं।

करीब 115 फीट ऊंचे हैं तिरंगे झंडे के पोल

दिल्ली में लगाए गए ये तिरंगे झंडे के पोल करीब 115 फीट ऊंचे हैं और इन पर लगे तिरंगे खास पॉलिएस्टर कपड़े से बनाए गए हैं ताकि वे लंबे समय तक टिक सकें। लेकिन हाल के दिनों में चली तेज हवाएं और खराब मौसम इन झंडों के लिए काफी भारी नुकसानदेह साबित हुई।

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PWD की टीमें पूरे शहर में सर्वे कर रही हैं और यह पता लगाया जा रहा है कि कितने तिरंगे को नुकसान पहुंचा है। जहां नुकसान मिला है, वहां नए ध्वज लगाए जाएंगे। अधिकारियों का कहना है कि चूंकि ये बहुत बड़े आकार के तिरंगे हैं, इसलिए उन्हें बदलने में थोड़ा समय लगेगा।

राजधानी में इन विशाल तिरंगों को लगाने की शुरुआत साल 2022 में की गई थी। उस समय आम आदमी पार्टी सरकार ने अपने 'देशभक्ति बजट' के तहत यह पहल शुरू की थी। मकसद था कि दिल्ली के हर इलाके में लोगों को तिरंगा दिखाई दे और देशभक्ति की भावना मजबूत हो।

ये तिरंगे शहर के प्रमुख चौराहों, सड़कों और महत्वपूर्ण स्थानों पर लगाए गए हैं। अधिकारियों के मुताबिक पूरी परियोजना भारत के ध्वज संहिता 2002 के नियमों के तहत लागू की गई थी।

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