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गोल्ड में पैसा लगाने का ये तरीका क्यों हुआ फ्लॉप? SEBI चेयरमैन ने बताई वजह

सोने में निवेश को लेकर भारतीयों की दिलचस्पी बनी हुई है, लेकिन इससे जुड़ा एक निवेश विकल्प अब भी लोगों को आकर्षित नहीं कर पा रहा है। सेबी चेयरमैन ने भी इसकी लोकप्रियता पर सवाल उठाए हैं। आखिर गोल्ड ETF के मुकाबले EGR क्यों पिछड़ रहा है? जानिए इसकी वजह।

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In Short

  • सोने की लोकप्रियता के बावजूद इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGR) निवेशकों को आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं।
  • NSE और BSE पर EGR का रोजाना कारोबार आमतौर पर ₹1 करोड़ से कम से लेकर कुछ करोड़ रुपये तक रहता है।
  • EGR को फिजिकल गोल्ड में बदलने पर 3% जीएसटी लगता है, जबकि एक्सचेंज पर इसकी ट्रेडिंग जीएसटी फ्री है।

सोना भारतीय निवेशकों के बीच हमेशा से निवेश का एक लोकप्रिय विकल्प रहा है। लेकिन सोने में निवेश का एक नया तरीका इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGRs) अब तक निवेशकों को खास आकर्षित नहीं कर पाया है। बाजार में सोने की जबरदस्त लोकप्रियता के बावजूद ईजीआर की खरीद-बिक्री काफी कम है। आखिर इसकी क्या वजह है और निवेशक इससे दूरी क्यों बना रहे हैं? आइए समझते हैं।

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गोल्ड ETF आगे, लेकिन EGR क्यों पिछड़ा?

सेबी (SEBI) के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने हाल ही में माना कि इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स उम्मीद के मुताबिक लोकप्रिय नहीं हो पाए हैं, जबकि गोल्ड ETF ने निवेशकों के बीच अच्छी जगह बनाई है। उन्होंने ईजीआर में फिजिकल गोल्ड की डिलीवरी से जुड़ी परेशानी का भी जिक्र किया।

दरअसल, ईजीआर के जरिए निवेशक एक्सचेंज पर फिजिकल गोल्ड की खरीद-बिक्री कर सकते हैं। इसके पीछे असली सोना होता है, जिसे मान्यता प्राप्त वॉल्ट में सुरक्षित रखा जाता है।

EGR में निवेशकों की दिलचस्पी क्यों कम?

बैंकबाजार के सीईओ आदिल शेट्टी के मुताबिक, सोने की लोकप्रियता का मतलब यह नहीं है कि उसमें निवेश करने का हर नया तरीका भी लोगों को पसंद आएगा।

उन्होंने बताया कि ईजीआर निवेश का अपेक्षाकृत नया तरीका है। निवेशक इसमें पैसा लगाने से पहले यह देखते हैं कि इसे एक्सचेंज पर खरीदना या बेचना कितना आसान है। साथ ही जरूरत पड़ने पर इसे असली सोने में बदलने की प्रक्रिया कितनी सरल है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

खरीद-बिक्री में भी आ रही परेशानी

ईजीआर के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक कम लिक्विडिटी है। यानी बाजार में इसकी खरीद-बिक्री करने वाले निवेशकों की संख्या सीमित है।

NSE और BSE पर ईजीआर का रोजाना कारोबार आमतौर पर ₹1 करोड़ से कम से लेकर कुछ करोड़ रुपये तक रहता है। वहीं, गोल्ड ETF और गोल्ड फ्यूचर्स में इससे कहीं ज्यादा कारोबार होता है।

कम ट्रेडिंग वॉल्यूम और खरीदने-बेचने की कीमतों में ज्यादा अंतर होने से निवेशकों को अपनी होल्डिंग जल्दी बेचने में परेशानी हो सकती है।

फिजिकल गोल्ड लेने पर 3% जीएसटी

EGR में टैक्स भी निवेशकों के लिए एक बड़ी चिंता है। एक्सचेंज पर EGR की ट्रेडिंग पर जीएसटी नहीं लगता, लेकिन इसे फिजिकल गोल्ड में बदलकर निकालने पर 3% जीएसटी देना पड़ता है।

इससे उन निवेशकों का खर्च बढ़ जाता है, जो आखिर में असली सोना लेना चाहते हैं। EGR को कमोडिटी के बजाय सिक्योरिटी माना जाता है। इससे संस्थागत निवेशकों और ज्वेलर्स के लिए इनपुट टैक्स क्रेडिट से जुड़ी दिक्कतें भी हो सकती हैं।

सोने को EGR में बदलना भी आसान नहीं

फिजिकल गोल्ड को ईजीआर में बदलने के लिए सोना सेबी में रजिस्टर्ड वॉल्ट मैनेजर के पास ले जाना होता है। वहां सोने की शुद्धता की जांच होती है और फिर इलेक्ट्रॉनिक रिसीट जारी की जाती है।

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इस प्रक्रिया में फीस लगती है। साथ ही मंजूरी प्राप्त वॉल्ट मैनेजर का नेटवर्क सीमित होने से परेशानी बढ़ती है। ज्वेलरी को ईजीआर में बदलने पर खरीद के समय दिया गया मेकिंग चार्ज भी वापस नहीं मिलता।

बाजार के जानकारों के मुताबिक, ईजीआर को लोकप्रिय बनाने के लिए लिक्विडिटी बढ़ाने, फिजिकल गोल्ड में बदलने की सुविधा बेहतर करने और पूरी प्रक्रिया आसान बनाने की जरूरत है। फिलहाल गोल्ड ETF और फिजिकल गोल्ड निवेशकों के लिए ज्यादा जाने-पहचाने विकल्प बने हुए हैं।

Disclaimer: ये आर्टिकल सिर्फ जानकारी के लिए है और इसे किसी भी तरह से इंवेस्टमेंट सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। BT Bazaar अपने पाठकों और दर्शकों को पैसों से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकारों से सलाह लेने का सुझाव देता है।