
भारत के पास सबकुछ फिर भी ग्लोबल ब्रांड्स में पीछे! निखिल कामथ ने बताया दक्षिण कोरिया से क्या सीखना होगा
भारतीय ब्रांड्स को दुनिया में बड़ी पहचान कैसे मिलेगी? जेरोधा के को-फाउंडर निखिल कामथ ने इसका दिलचस्प तरीका बताया है। उन्होंने दक्षिण कोरिया का उदाहरण देते हुए भारत की संस्कृति को ग्लोबल बनाने पर जोर दिया। साथ ही जापान से तुलना कर बताया कि भारत कहां पीछे है और क्या बदलना जरूरी है।

In Short
- निखिल कामथ ने भारतीय ब्रांड्स को ग्लोबल बनाने के लिए सिर्फ प्रोडक्ट्स नहीं, बल्कि संस्कृति एक्सपोर्ट करने का सुझाव दिया।
- ग्लोबल ब्रांड वैल्यू में जापान की हिस्सेदारी 5.6 फीसदी है, जबकि भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 1.7 फीसदी है।
- निखिल कामथ के मुताबिक, योग, आयुर्वेद, फैशन, मसाले और स्किनकेयर जैसे क्षेत्रों में भारतीय ब्रांड्स के लिए बड़ा मौका है।
भारत के ब्रांड्स को पूरी दुनिया में पहचान कैसे मिल सकती है? इस सवाल पर जेरोधा के को-फाउंडर निखिल कामथ ने एक दिलचस्प सुझाव दिया है। उनका मानना है कि भारत को सिर्फ अपने प्रोडक्ट्स विदेशों में बेचने पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि अपनी संस्कृति को भी दुनिया तक पहुंचाना चाहिए। इसके लिए उन्होंने दक्षिण कोरिया का उदाहरण दिया है, जिसकी संस्कृति, खानपान और प्रोडक्ट्स आज दुनियाभर में पसंद किए जा रहे हैं।
दक्षिण कोरिया से क्या सीख सकता है भारत?
निखिल कामथ ने 29 सितंबर को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर किया। इसमें उन्होंने बताया कि दक्षिण कोरिया ने पहले अपनी संस्कृति को दुनिया तक पहुंचाया और उसके बाद कोरियाई प्रोडक्ट्स की मांग बढ़ी।
निखिल कामथ के मुताबिक, भारत के पास भी बॉलीवुड, संगीत, खानपान, फैशन, योग और आयुर्वेद जैसी कई चीजें हैं। ये भारत की ऐसी सांस्कृतिक ताकत हैं, जिनकी बराबरी करना दूसरे देशों के लिए आसान नहीं है।
उनका कहना है कि भारत को सिर्फ सामान एक्सपोर्ट करने के बजाय अपनी संस्कृति को भी योजनाबद्ध तरीके से दुनिया तक पहुंचाना चाहिए। इसके बाद भारतीय कंज्यूमर ब्रांड्स के लिए विदेशों में जगह बनाना आसान हो सकता है।
जापान के मुकाबले कहां खड़ा है भारत?
निखिल कामथ ने भारत और जापान के आंकड़ों के जरिए भी अपनी बात समझाई। उनके मुताबिक, दुनिया की GDP में जापान की हिस्सेदारी 3.5 फीसदी और भारत की 3.3 फीसदी है।
लेकिन ग्लोबल ब्रांड वैल्यू में जापान की हिस्सेदारी 5.6 फीसदी है, जबकि भारत की सिर्फ 1.7 फीसदी है। निखिल कामथ का तर्क है कि भारतीय प्रोडक्ट्स की मांग कभी समस्या नहीं रही, बल्कि उन्हें ग्लोबल ब्रांड बनाने पर ध्यान देने की जरूरत है।

कभी दुनिया में था भारतीय सामान का दबदबा
निखिल कामथ ने भारत के पुराने व्यापारिक इतिहास का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि भारत कभी रोम को काली मिर्च और मोती जैसे सामान बेचता था, जिनकी कीमत सालाना पांच लाख सिक्कों के बराबर थी।
भारतीय कपड़े भी इतने लोकप्रिय हुए कि ब्रिटेन ने उन पर प्रतिबंध लगा दिया था। इतना ही नहीं, कश्मीरी से कैशमियर, कालीकट से कैलिको जैसे नाम दुनिया में पहुंचे। खाकी, पायजामा और योग जैसे शब्द भी भारत से निकले।
हालांकि, कामथ के मुताबिक, ये नाम दुनिया में तो पहुंचे, लेकिन भारत इनसे जुड़े ब्रांड्स पर अपनी पहचान स्थापित नहीं कर पाया।
भारतीय ब्रांड्स के पास क्या है बड़ा मौका?
निखिल कामथ ने कहा कि भारत की 1.4 अरब आबादी उसकी बड़ी ताकत है। अमेरिका और चीन की तरह भारतीय ब्रांड्स पहले अपने घरेलू बाजार में बड़े हो सकते हैं और फिर विदेशों में कारोबार बढ़ा सकते हैं।
स्वीडन, स्विट्जरलैंड और दक्षिण कोरिया जैसे कम आबादी वाले देशों के सामने घरेलू बाजार को लेकर ज्यादा चुनौतियां थीं।
निखिल कामथ के मुताबिक, भारत के पास योग के अलावा स्पेशल चाय, प्रीमियम कपड़े, स्किनकेयर, मसाले, आयुर्वेद, सस्टेनेबिलिटी, लग्जरी और वेलनेस जैसे कई क्षेत्र हैं। उनका मानना है कि भारत को अपनी पुरानी परंपराओं और तौर-तरीकों को नए नजरिए से देखने की जरूरत है।

