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रिटायरमेंट के बाद दिल्ली-मुंबई छोड़ इन शहरों में क्यों बस रहे लोग? वजह जानकर हो जाएंगे हैरान

रिटायरमेंट के बाद अब कई लोग दिल्ली-मुंबई जैसे बड़े शहरों की जगह छोटे और धार्मिक शहरों में बसने का विकल्प तलाश रहे हैं। महंगा रहन-सहन, प्रदूषण और ट्रैफिक इसकी बड़ी वजह हैं। भोपाल, ऋषिकेश, हरिद्वार और वाराणसी जैसे शहर लोगों का ध्यान खींच रहे हैं। लेकिन क्या सिर्फ कम खर्च और शांत माहौल रिटायरमेंट के लिए काफी है? जानिए पूरी कहानी।

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भारत का सीनियर हाउसिंग बाजार 2026 में 4.31 अरब डॉलर का अनुमानित है, जिसके 2031 तक बढ़कर 11.43 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। (फोटो: इंडिया टुडे)
भारत का सीनियर हाउसिंग बाजार 2026 में 4.31 अरब डॉलर का अनुमानित है, जिसके 2031 तक बढ़कर 11.43 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। (फोटो: इंडिया टुडे)

In Short

  • रिटायरमेंट के बाद छोटे और धार्मिक शहरों की ओर बढ़ रहा रुझान।
  • भोपाल, ऋषिकेश और वाराणसी जैसे शहर बन रहे नए विकल्प।
  • - सीनियर हाउसिंग बाजार 2031 तक 11.43 अरब डॉलर पहुंचने का अनुमान।

नौकरी और कारोबार के लिए लोग अक्सर दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में बस जाते हैं। लेकिन क्या रिटायरमेंट के बाद भी उसी शहर में रहना जरूरी है? अब कई लोग रिटायरमेंट के बाद बड़े शहरों की भागदौड़ छोड़कर छोटे शहरों और धार्मिक स्थलों के आसपास बसने का विकल्प तलाश रहे हैं। इसकी बड़ी वजह महंगा रहन-सहन, ट्रैफिक, प्रदूषण और शांत जिंदगी की चाहत है।

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दिल्ली-NCR में सरकारी बीमा कंपनी से रिटायर हुए 64 साल के राजेश मेहता (बदला हुआ नाम) और उनकी पत्नी श्वेता के सामने भी यही सवाल था। उनकी दोनों बेटियां अमेरिका में बस चुकी हैं। ऐसे में उन्होंने दिल्ली-NCR छोड़ने पर विचार किया। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं, रिश्तेदारों की नजदीकी और कम खर्च के कारण उन्हें भोपाल एक अच्छा विकल्प लगा।

इसी तरह मुंबई में लंबे समय तक कारोबार करने वाले प्रताप शर्मा ने भी रिटायरमेंट के बाद पत्नी के साथ ऋषिकेश में बसने का फैसला किया। वहां उनके रिश्तेदार रहते हैं और मुंबई के मुकाबले जिंदगी शांत और कम खर्चीली हो सकती है।

बड़े शहरों को छोड़ने की क्या है वजह?

नौकरी के दौरान बड़े शहर बेहतर रोजगार और सुविधाओं के कारण लोगों की पहली पसंद होते हैं। लेकिन रिटायरमेंट के बाद प्राथमिकताएं बदल जाती हैं।

अब लोगों के लिए ऑफिस की दूरी से ज्यादा जरूरी अस्पताल, डॉक्टर, परिवार के लोग और शांत माहौल हो जाता है। बड़े शहरों में महंगे मकान, मेंटेनेंस का खर्च, ट्रैफिक और प्रदूषण भी परेशानी बढ़ाते हैं।

छोटे शहरों में रहने का खर्च अपेक्षाकृत कम हो सकता है। इससे रिटायरमेंट के बाद बचाए गए पैसों का इस्तेमाल स्वास्थ्य, घूमने-फिरने और दूसरी जरूरतों के लिए किया जा सकता है।

रिटायरमेंट के लिए कौन से शहर बन रहे पहली पसंद?

प्रॉपटेक कंपनी Square Yards की रिपोर्ट 'Expanding Horizons: The Next Growth Markets for Senior Living in India' के मुताबिक, भारत का सीनियर हाउसिंग बाजार 2026 में करीब 4.31 अरब डॉलर का है। अनुमान है कि 2031 तक यह बढ़कर 11.43 अरब डॉलर पहुंच सकता है।

रिपोर्ट में 15 ऐसे शहरों की पहचान की गई है, जो आने वाले समय में बुजुर्गों के लिए आवास के बड़े बाजार बन सकते हैं।

बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और चेन्नई जैसे शहरों के अलावा कोयंबटूर, वडोदरा, नासिक, कोच्चि और मैसूरु भी लोगों का ध्यान खींच रहे हैं।

वहीं, अयोध्या, वाराणसी, हरिद्वार और तिरुपति जैसे धार्मिक शहर भी रिटायरमेंट के बाद रहने और दूसरा घर खरीदने के विकल्प के तौर पर उभर रहे हैं।

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सिर्फ सस्ता घर नहीं, ये सुविधाएं भी जरूरी

रिटायरमेंट के बाद घर चुनते समय सिर्फ कीमत देखना काफी नहीं है। उम्र बढ़ने के साथ अस्पताल, विशेषज्ञ डॉक्टर, दवाइयों की दुकान, परिवहन और इमरजेंसी सेवाओं की जरूरत बढ़ सकती है।

Square Yards के फाउंडर और CEO तनुज शोरी के मुताबिक, भारत में सीनियर लिविंग का बाजार तेजी से उभर रहा है। बुजुर्ग अब केवल देखभाल नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और अच्छी जीवनशैली भी चाहते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, भविष्य में ऐसी रिहायशी सोसायटियों की मांग बढ़ सकती है, जहां फिजियोथेरेपी, फिटनेस, पौष्टिक भोजन, नियमित स्वास्थ्य जांच और सामाजिक गतिविधियों की सुविधाएं हों।

Square Yards की वाइस प्रेसिडेंट रिसर्च एंड इनसाइट्स सुनीता मिश्रा के मुताबिक, सीनियर लिविंग में अब सिर्फ लोकेशन नहीं, बल्कि मिलने वाली सुविधाएं भी अहम हैं। लोग अपने बजट में बेहतर देखभाल और आरामदायक जीवन के लिए छोटे शहरों में जाने को तैयार हैं।

रिटायरमेंट के बाद शहर बदलने से पहले क्या सोचें?

छोटे शहर में बसने के कई फायदे हो सकते हैं, लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं। पुराने दोस्तों, परिचित डॉक्टरों और अपने सामाजिक दायरे से दूर होने पर अकेलापन महसूस हो सकता है।

धार्मिक शहरों में त्योहारों के दौरान भारी भीड़ और ट्रैफिक की परेशानी भी हो सकती है। इसके अलावा इलाज, घरेलू मदद, मेंटेनेंस और परिवार से मिलने के लिए यात्रा का खर्च भी ध्यान में रखना जरूरी है।

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ऐसे में नया घर खरीदने से पहले कुछ महीने उस शहर में रहकर वहां की सुविधाओं और वास्तविक खर्च को समझना बेहतर हो सकता है।

रिटायरमेंट के बाद सही शहर वही होगा, जहां कम खर्च के साथ बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, परिवार का साथ और आत्मनिर्भर जीवन जीने का मौका मिल सके।

Disclaimer: ये आर्टिकल सिर्फ जानकारी के लिए है और इसे किसी भी तरह से इंवेस्टमेंट सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। BT Bazaar अपने पाठकों और दर्शकों को पैसों से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकारों से सलाह लेने का सुझाव देता है।