Participating Life Insurance Plans क्या होते हैं? जानें बोनस से कैसे बढ़ सकता है पॉलिसी का फायदा
पार्टिसिपेटिंग लाइफ इंश्योरेंस प्लान में पॉलिसीधारकों को बीमा कंपनी के फंड के प्रदर्शन के आधार पर बोनस मिल सकता है। जानें पार और नॉन पार प्लान में क्या अंतर है और बोनस कैसे तय किया जाता है।

In Short
- पार्टिसिपेटिंग प्लान में पॉलिसीधारकों को बीमा कंपनी के पार्टिसिपेटिंग फंड के प्रदर्शन के आधार पर बोनस मिल सकता है
- IRDAI के नियमों के अनुसार एक्ट्यूरीयल सरप्लस का कम से कम 90 प्रतिशत हिस्सा पार्टिसिपेटिंग पॉलिसीधारकों को दिया जाता है
- रिवर्जनरी बोनस टर्मिनल बोनस और कैश बोनस के जरिए पॉलिसीधारकों को अतिरिक्त फायदा मिल सकता है
Participating Life Insurance Plans: पार्टिसिपेटिंग लाइफ इंश्योरेंस प्लान को आमतौर पर “पार प्लान” कहा जाता है। इन योजनाओं में पॉलिसीधारक बीमा कंपनी के पार्टिसिपेटिंग फंड से मिलने वाले अतिरिक्त लाभ में हिस्सा लेते हैं। सामान्य बीमा योजनाओं में शुरुआत में ही फायदे तय होते हैं, लेकिन पार्टिसिपेटिंग प्लान में फंड के प्रदर्शन के आधार पर बोनस मिल सकता है।
आदित्य बिड़ला सन लाइफ इंश्योरेंस के चीफ एक्चुरियल ऑफिसर नकुल यादव ने बताया कि पार्टिसिपेटिंग पॉलिसी लेने वाला व्यक्ति बीमा कंपनी के पार्टिसिपेटिंग फंड के वित्तीय प्रदर्शन में भागीदार बन जाता है। अगर कंपनी को अच्छे निवेश रिटर्न, बेहतर क्लेम अनुभव या कामकाज को बेहतर तरीके से चलाने से फायदा होता है, तो उस अतिरिक्त राशि का एक हिस्सा पॉलिसीधारकों को बोनस के रूप में दिया जाता है।
पार और नॉन पार प्लान में क्या अंतर है
नकुल यादव के अनुसार, पार्टिसिपेटिंग प्लान और नॉन पार्टिसिपेटिंग यानी “नॉन पार” प्लान में बड़ा अंतर होता है। नॉन पार प्लान में मिलने वाले फायदे पहले से तय और पूरी तरह गारंटी वाले होते हैं। इनमें बीमा कंपनी के प्रदर्शन का कोई असर नहीं पड़ता।
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वहीं पार्टिसिपेटिंग प्लान में लंबे समय के लिए निवेश करने वाले लोगों को फायदा मिल सकता है। हालांकि इसमें मिलने वाला बोनस पहले से तय नहीं होता और यह बीमा कंपनी के फंड के प्रदर्शन पर निर्भर करता है।
बोनस बांटने का तरीका क्या है
पार्टिसिपेटिंग फंड पर कुछ नियम लागू होते हैं। नकुल यादव के मुताबिक, पार फंड को अलग रखा जाता है और इसके अतिरिक्त पैसे का आकलन एक एक्चुरी यानी बीमा गणना विशेषज्ञ करता है।
आईआरडीएआई के नियमों के अनुसार, एक्चुरियल सरप्लस का 10 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा शेयरधारकों को नहीं दिया जा सकता। वहीं कम से कम 90 प्रतिशत हिस्सा पार्टिसिपेटिंग पॉलिसीधारकों को बांटना होता है।
हर साल होने वाली गणना में निवेश का प्रदर्शन, मृत्यु दर, खर्चों का प्रबंधन, पॉलिसी जारी रखने वाले ग्राहकों की संख्या और टैक्स से जुड़े अनुभव जैसे कई पहलुओं को देखा जाता है।
पॉलिसीधारकों को किस तरह का बोनस मिल सकता है
नकुल यादव ने बताया कि आमतौर पर तीन तरह के बोनस दिए जाते हैं। रिवर्जनरी बोनस हर साल सम एश्योर्ड के प्रतिशत के रूप में घोषित किया जाता है। एक बार घोषित होने के बाद यह पॉलिसी के फायदे का हिस्सा बन जाता है और इसे कम नहीं किया जा सकता।
टर्मिनल बोनस पॉलिसी पूरी होने या मृत्यु क्लेम के समय दिया जा सकता है। यह लंबे समय में पार्टिसिपेटिंग फंड के प्रदर्शन को दिखाता है। वहीं कैश बोनस पॉलिसी चलने के दौरान सीधे पॉलिसीधारक को दिया जाता है।
बोनस की दर पहले से तय नहीं होती
नकुल यादव ने उदाहरण देते हुए बताया कि अगर 10 लाख रुपये की 20 साल की पार्टिसिपेटिंग एंडोमेंट पॉलिसी में हर साल 5 प्रतिशत सिंपल रिवर्जनरी बोनस दिया जाए, तो हर साल 50 हजार रुपये जुड़ेंगे। 20 साल तक यही दर रहने पर 10 लाख रुपये का बोनस जमा हो सकता है। अगर 1.5 लाख रुपये का टर्मिनल बोनस भी मिले, तो मैच्योरिटी वैल्यू 21.5 लाख रुपये हो सकती है।
हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि बोनस की दर पहले से तय या गारंटी नहीं होती। यह निवेश की स्थिति, क्लेम अनुभव और आर्थिक माहौल के आधार पर बदल सकती है। इसलिए पॉलिसी लेने से पहले बीमा कंपनी के पार्टिसिपेटिंग फंड को संभालने के पुराने रिकॉर्ड को देखना जरूरी है।

