
म्यूचुअल फंड में फंड मैनेजर की स्ट्रैटेजी कितनी महत्वपूर्ण होती है? समझिए पूरा खेल
फ्लेक्सी कैप फंड चुनते समय निवेशक अक्सर बड़े फंड हाउस और फंड मैनेजर के ट्रैक रिकॉर्ड पर भरोसा करते हैं। लेकिन हालिया प्रदर्शन कुछ अलग संकेत दे रहा है। एक्सपर्ट के मुताबिक, पोर्टफोलियो में एक खास तरह का एलोकेशन रिटर्न में बड़ा अंतर पैदा कर रहा है। जानिए पूरा गणित।

In Short
- फ्लेक्सी कैप फंड्स के प्रदर्शन में मार्केट कैप एलोकेशन बन रहा अहम फैक्टर।
- मिड और स्मॉल कैप में ज्यादा हिस्सेदारी वाले कुछ फंड्स ने बेहतर प्रदर्शन दिखाया।
- एक्सपर्ट ने मिड और स्मॉल कैप को लेकर लंबी अवधि का भरोसा जताया।
म्यूचुअल फंड में निवेश करते समय कई निवेशक फंड मैनेजर की पहचान और फंड हाउस के नाम को काफी अहमियत देते हैं। लेकिन फ्लेक्सी-कैप कैटेगरी में तस्वीर कुछ अलग नजर आ रही है। बिजनेस टुडे के शो में सीनियर एंकर साक्षी बत्रा के सवालों का जवाब देते हुए इन्वेस्ट एट ईज के फाउंडर शरद टंडन ने कहा कि, इस कैटेगरी में बेहतर प्रदर्शन सिर्फ बड़े नाम वाले फंड नहीं कर रहे हैं, बल्कि पोर्टफोलियो में पैसा कहां लगाया गया है, यह रिटर्न का बड़ा कारण बन रहा है।
मिड और स्मॉल कैप में ज्यादा निवेश का असर
एक्सपर्ट ने एक साल, तीन साल और पांच साल के प्रदर्शन की तुलना करते हुए बताया कि बेहतर प्रदर्शन करने वाले फ्लेक्सी-कैप फंड्स में मिड और स्मॉल कैप शेयरों की हिस्सेदारी ज्यादा दिखाई देती है।
उन्होंने बैंक ऑफ इंडिया फ्लेक्सी कैप का उदाहरण देते हुए कहा कि यह प्रदर्शन के मामले में ऊपर नजर आता है। इसकी एक बड़ी वजह स्मॉल कैप में करीब 30 से 40 फीसदी तक का एलोकेशन बताया गया। वहीं मिड और स्मॉल कैप को मिलाकर इसकी हिस्सेदारी करीब 40 से 45 फीसदी है।
बड़े नाम वाले फंड्स में लार्ज कैप का दबदबा
इन्वेस्ट एट ईज के फाउंडर शरद टंडन के मुताबिक, HDFC, प्रूडेंशियल, कोटक, आदित्य बिड़ला और पराग पारिख जैसे कई जाने-पहचाने फ्लेक्सी-कैप फंड्स में लार्ज कैप शेयरों की हिस्सेदारी करीब 60 से 65 फीसदी तक है।
उनका कहना है कि बाजार में लार्ज कैप के बाहर के सेगमेंट के बेहतर प्रदर्शन की वजह से ज्यादा लार्ज कैप हिस्सेदारी वाले फंड्स के रिलेटिव रिटर्न पर असर पड़ा है।

सिर्फ फ्लेक्सिबिलिटी से नहीं मिलेगा बेहतर रिटर्न
एक्सपर्ट के मुताबिक, किसी फंड का फ्लेक्सी-कैप होना ही बेहतर प्रदर्शन की गारंटी नहीं है। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि फंड मैनेजर इस फ्लेक्सिबिलिटी का इस्तेमाल कैसे करता है और अलग-अलग मार्केट कैप में कितना पैसा लगाता है।
यानी फंड मैनेजर का ट्रैक रिकॉर्ड और उसकी निवेश रणनीति अहम है, लेकिन फ्लेक्सी-कैप फंड में यह देखना भी जरूरी हो जाता है कि वह लार्ज, मिड और स्मॉल कैप के बीच निवेश को किस तरह बांट रहा है।
मिड और स्मॉल कैप पर लंबी अवधि का भरोसा
एक्सपर्ट ने मिड और स्मॉल कैप को लेकर लंबी अवधि का भरोसा भी जताया। उन्होंने इसे भारत की लॉन्ग टर्म ग्रोथ, घरेलू खपत और उभरते सेक्टर्स से जोड़ा। उनका मानना है कि ऐसे कई सेक्टर्स लार्ज कैप के मुकाबले मिड और स्मॉल कैप में ज्यादा देखने को मिल सकते हैं।
एक्सपर्ट का मानना है कि यह कहानी आगे भी जारी रह सकती है और कम से कम अगले दशक तक इसका असर देखने को मिल सकता है। ऐसे में फ्लेक्सी-कैप फंड चुनते समय सवाल सिर्फ यह नहीं रह जाता कि पैसा कौन मैनेज कर रहा है, बल्कि यह भी अहम है कि पैसा आखिर लगाया कहां जा रहा है।

