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स्मॉल कैप मिड कैप से सेक्टरल फंड तक! जानिए हाई रिस्क म्यूचुअल फंड में निवेश के फायदे और जरूरी सावधानियां

म्यूचुअल फंड में हाई या वेरी हाई रिस्क देखकर कई निवेशक घबरा जाते हैं। लेकिन ज्यादा जोखिम का मतलब सिर्फ नुकसान नहीं होता, इसमें ज्यादा रिटर्न की संभावना भी जुड़ी होती है। जानिए स्मॉल कैप मिड कैप और सेक्टरल फंड में जोखिम क्यों बढ़ता है और निवेश से पहले किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

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AI Generated Image

In Short

  • हाई रिस्क म्यूचुअल फंड में इक्विटी एक्सपोजर और बाजार के उतार चढ़ाव के कारण जोखिम ज्यादा होता है।
  • स्मॉल कैप मिड कैप और सेक्टरल फंड में ज्यादा रिटर्न की संभावना के साथ ज्यादा उतार चढ़ाव भी हो सकता है।
  • निवेश से पहले रिस्कोमीटर के साथ फंड की रणनीति निवेश अवधि और अपने वित्तीय लक्ष्य को समझना जरूरी है।

म्यूचुअल फंड में निवेश करते समय कई बार रिस्कोमीटर पर हाई या वेरी हाई रिस्क लिखा दिखाई देता है। इसे देखकर निवेशक सोचने लगते हैं कि क्या ऐसी स्कीम में पैसा लगाना सही होगा। लेकिन हाई रिस्क का मतलब सिर्फ खतरा नहीं होता, बल्कि इसमें ज्यादा रिटर्न की संभावना भी जुड़ी होती है। इसलिए निवेश से पहले यह समझना जरूरी है कि जोखिम किन वजहों से बढ़ता है।

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हाई रिस्क म्यूचुअल फंड में क्यों बढ़ता है जोखिम

म्यूचुअल फंड में जोखिम तब ज्यादा माना जाता है जब बाजार के उतार चढ़ाव का असर उसके पोर्टफोलियो पर ज्यादा पड़ सकता है। इसका सबसे बड़ा कारण इक्विटी में ज्यादा निवेश होता है, क्योंकि शेयरों की कीमत बाजार की स्थिति के अनुसार बदलती रहती है।

छोटी और उभरती कंपनियों में निवेश करने वाले फंड में भी उतार चढ़ाव ज्यादा हो सकता है। वहीं सेक्टरल और थीमैटिक फंड किसी खास सेक्टर या थीम पर फोकस करते हैं, जिससे उस सेक्टर से जुड़े बदलावों का सीधा असर फंड के प्रदर्शन पर पड़ता है।

रिस्कोमीटर से समझें जोखिम का स्तर

सेबी ने निवेशकों को फंड का जोखिम समझाने के लिए रिस्कोमीटर शुरू किया है। इसमें लो से लेकर वेरी हाई तक जोखिम स्तर दिखाया जाता है।

रिस्कोमीटर फंड के पोर्टफोलियो, एसेट अलोकेशन और निवेश के आधार पर तय होता है। हालांकि निवेश का फैसला सिर्फ रिस्कोमीटर देखकर नहीं लेना चाहिए, बल्कि फंड की रणनीति और निवेश अवधि को भी समझना जरूरी है।

स्मॉल कैप और मिड कैप फंड में ज्यादा उतार चढ़ाव

स्मॉल कैप फंड 251वें नंबर और उसके बाद आने वाली मार्केट कैप वाली कंपनियों में निवेश करते हैं। इनमें ग्रोथ की संभावना ज्यादा होती है, लेकिन शेयरों में उतार चढ़ाव भी ज्यादा देखने को मिल सकता है। एसबीआई स्मॉल कैप फंड छोटी कंपनियों के इक्विटी शेयरों में निवेश करता है और इसे वेरी हाई रिस्क कैटेगरी में रखा गया है।

वहीं मिड कैप फंड 101वें से 250वें नंबर तक की कंपनियों में निवेश करते हैं। एसबीआई मिडकैप फंड भी मिड कैप इक्विटी शेयरों में निवेश करता है और इसे वेरी हाई रिस्क रेटिंग मिली हुई है।

सेक्टरल और थीमैटिक फंड में बढ़ता है जोखिम

सेक्टरल और थीमैटिक फंड किसी खास सेक्टर या निवेश थीम पर आधारित होते हैं। इससे रिटर्न की संभावना बढ़ सकती है, लेकिन एक ही सेक्टर पर निर्भरता के कारण जोखिम भी बढ़ जाता है।

एसबीआई हेल्थकेयर अपॉर्च्युनिटीज फंड अपनी एसेट का कम से कम 80 प्रतिशत हिस्सा फार्मास्यूटिकल और हेल्थकेयर कंपनियों में निवेश करता है। वहीं एसबीआई पीएसयू फंड सरकारी कंपनियों के शेयरों में निवेश करता है। दोनों फंड वेरी हाई रिस्क कैटेगरी में आते हैं।

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क्या हाई रिस्क का मतलब ज्यादा रिटर्न है

हाई रिस्क फंड में ज्यादा रिटर्न की संभावना हो सकती है, लेकिन इसकी गारंटी नहीं होती। निवेश का प्रदर्शन बाजार की स्थिति, पोर्टफोलियो और निवेश की अवधि पर निर्भर करता है।

ऐसे फंड उन निवेशकों के लिए बेहतर हो सकते हैं जो लंबे समय तक निवेश बनाए रख सकते हैं और बाजार के उतार चढ़ाव को समझते हैं। निवेश से पहले फंड की रणनीति, पोर्टफोलियो और अपने वित्तीय लक्ष्य को जरूर समझना चाहिए।

निवेश से पहले रखें इन बातों का ध्यान

निवेशकों को समय समय पर अपने पोर्टफोलियो की समीक्षा करनी चाहिए और पूरे निवेश में संतुलन बनाए रखना चाहिए। एसआईपी के जरिए धीरे धीरे निवेश किया जा सकता है, हालांकि इससे बाजार जोखिम खत्म नहीं होता।

हाई रिस्क या वेरी हाई रिस्क लिखा होना किसी फंड को खराब नहीं बनाता। सही निवेश वही है जो आपकी जरूरत, लक्ष्य और जोखिम उठाने की क्षमता के हिसाब से हो।

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Disclaimer: म्यूचुअल फंड्स निवेश बाज़ार जोखिमों के अधीन है। ये आर्टिकल सिर्फ जानकारी के लिए है और इसे किसी भी तरह से इंवेस्टमेंट सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। BT Bazaar अपने पाठकों और दर्शकों को पैसों से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकारों से सलाह लेने का सुझाव देता है।