कैसे हुई BATA की शुरुआत?
साल 1931 में थॉमस बाटा की एक हवाई हादसे में मौत हो गई। उनकी मौत के बाद उनके बेटे थॉमस जे बाटा ने कारोबार संभाला। कारोबार के विस्तार के लिए रबर और चमड़े की खोज में वो भारत पहुंचे। जहां उन्होंने लोगों को बिना जूतों के देखा। उस दौर में भारत में कोई जूता कंपनी नहीं थी इसलिए थॉमस जे ने साल 1932 में कोलकाता से सटे कोन्नार के एक छोटे से गांव में BATA फैक्ट्री की शुरुआत की।

कैसे हुई BATA की शुरुआत?
ये कहानी है एक ऐसे ब्रांड की, जो देखते ही देखते पूरे हिन्दुस्तान का चहेता हो गया, आम से खास तक हर किसी के पैरों की ये शान बन गया। ये कहानी है भारत के सबसे बड़े फुटवियर रिटेलर BATA की। हम भारतीयों के जुबान और पैरों पर BATA इस कदर चढ़ा कि विदेशी कंपनी होने के बावजूद ज्यादातर भारतीय इसे देसी ही मानने लगे।
चेकोस्लोवाकिया के बेहद गरीब परिवार में जन्मे थॉमस बाटा ने BATA कंपनी की शुरुआत 1894 में की थी। अपने शुरुआती कारोबारी सफर में थॉमस बाटा ने नई ऊंचाइया छुईं, लेकिन एक वक्त ऐसा भी आया जब कंपनी दिवालिया घोषित हो गई, लेकिन थॉमस ने हार नहीं मानी। वो इंग्लैंड गए, जूता कंपनी में मजदूरी की और कारोबार की बारीकियां सीख कर, नए सिरे से शुरुआत की।
कैसे BATA ने दुनिया में बनाई पहचान?
दुनिया भर में BATA की पहचान प्रथम विश्वयुद्ध के साथ आई मंदी के बाद से हुई। बिक्री कम होने के चलते उत्पादन में कमी आई,ऐसे में नुकसान BATA को भी हुआ, लेकिन इसे मौके में बदलते हुए थॉमस ने जूतों-चप्पलों के कीमतें आधी कर दी, जिससे अचनाक मांग बहुत तेजी से बढ़ी और पूरी दुनिया में BATA की नई पहचान बनी।
भारत कैसे पहुंची BATA कंपनी?
साल 1931 में थॉमस बाटा की एक हवाई हादसे में मौत हो गई। उनकी मौत के बाद उनके बेटे थॉमस जे बाटा ने कारोबार संभाला। कारोबार के विस्तार के लिए रबर और चमड़े की खोज में वो भारत पहुंचे। जहां उन्होंने लोगों को बिना जूतों के देखा। उस दौर में भारत में कोई जूता कंपनी नहीं थी इसलिए थॉमस जे ने साल 1932 में कोलकाता से सटे कोन्नार के एक छोटे से गांव में BATA फैक्ट्री की शुरुआत की।
BATA ने भारत में कैसे बढ़ाया कोराबार
देश में पहली शू कंपनी स्थापित होने के दो साल में ही जूतों की मांग इतनी बढ़ गई कि कंपनी को अपना उत्पादन दोगुना बढ़ाना पड़ा। बिहार, फरीदाबाद समेत एक के बाद एक 5 फैक्टरियां शुरू हुईं। साल 1939 तक कंपनी के पास 4000 के करीब कर्मचारी थे।
दूसरी कंपनियों को कैसे पछाड़ा?
साल 1980 के दशक में बाटा को खादी और पैरागॉन से कड़ी टक्कर मिलने लगी थी। ऐसे में कंपनी ने प्रोडक्ट की मजबूती और कम कीमत और बच्चे से लेकर बढ़े हर वर्ग पर फोकस किया, साथ ही विज्ञापन का सहारा लिया। कंपनी ने कई आकर्षक टैग लाइन दी, जिनमें से एक थी फर्स्ट टू बाटा, देन टू स्कूल जो काफी लोकप्रिय हुई।
भारतीय बाजार में कब हुई लिस्टिंग?
BATA की लिस्टिंग जून 1973 में हुई। इसका IPO 30 रुपये प्रति शेयर के भाव पर आया था। BATA कंपनी जूतों के अलावा, बैग, मोजे,पॉलिश आदि का भी सामान बनाती है और बेचती है।
मौजूदा दौर में BATA की स्थिति
भारत में BATA को आए 90 साल पूरे हो चुके हैं। कंपनी ने शुरुआत से ही दाम कम रखे, ताकि भारत के शू मार्केट पर अपनी पकड़ बना ली जाए। आज भारत के 35% शू मार्केट पर बाटा का कब्जा है और ये नंबर-1 बना हुआ है। BATA के देश में 1375 रिटेल स्टोर हैं जिसमें 8500 कर्मचारी काम करते हैं। BATA इंडिया की सालाना कमाई मार्च 2020 में 3156 करोड़ रुपए पहुंच गई थी। हालांकि, कोरोना महामारी की वजह से मार्च 2021 में ये घटकर करीब 1539 करोड़ रुपए रह गई। लेकिन फिर कंपनी का फोकस एक्सपेंशन की ओर है। मतलब कल भी, आज भी, कल भी। बाटा का सफर जारी है।