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होर्मुज संकट से दुनिया में मची हलचल! तेल और गैस की सप्लाई पर मंडराया खतरा, भारत पर कितना असर?

होर्मुज संकट ने दुनिया की ऊर्जा सप्लाई को लेकर एक बड़ा खतरा सामने ला दिया है। तेल और गैस की कीमतों में उछाल के बीच वैकल्पिक रास्ते भी पूरी राहत नहीं दे पाए। ऐसे में सवाल है कि अगला बड़ा संकट आने पर भारत समेत दुनिया के दूसरे देश अपनी जरूरतें कैसे पूरी करेंगे?

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In Short

  • होर्मुज संकट के चरम पर दुनिया की करीब 14% तेल और गैस सप्लाई प्रभावित हुई।
  • तेल के भंडार और वैकल्पिक रास्तों के सहारे बाजार ने संकट संभाला, लेकिन इनकी सीमाएं भी सामने आईं।
  • भारत और चीन का करीब 84% ऊर्जा व्यापार समुद्री चोकपॉइंट्स से होकर गुजरता है।

दुनिया की ऊर्जा सप्लाई के सबसे अहम समुद्री रास्तों में शामिल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर आए संकट ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। इस रास्ते से हर दिन करीब 2.1 करोड़ बैरल तेल गुजरता है। ऐसे में यहां सप्लाई रुकने का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

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मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट (MGI) के मुताबिक, 2026 के होर्मुज संकट के चरम पर दुनिया की करीब 14% तेल और गैस सप्लाई प्रभावित हुई। यह 1970 के दशक के बड़े तेल झटकों से दोगुने से भी ज्यादा था।

कम खपत से कैसे संभला संकट?

MGI के अनुमान के मुताबिक, संकट के दौरान बाजार से बाहर हुई तेल सप्लाई का करीब 45% हिस्सा खपत घटाकर संभाला गया। यह करीब 68 लाख बैरल प्रतिदिन के बराबर था।

चीन ने तेल आयात घटाया, जबकि अमेरिका ने एक्सपोर्ट बढ़ाया। इससे बाजार को कुछ राहत मिली। हालांकि, इस संकट ने यह भी दिखाया कि तेल के भंडार और वैकल्पिक सप्लाई की अपनी सीमाएं हैं।

वैकल्पिक रास्ते भी नहीं हैं पूरी तरह सुरक्षित

संकट के दौरान तेल की कीमतें बढ़ीं और भंडार घटने लगे। सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन में आए व्यवधान ने भी मुश्किलें बढ़ाईं।

यह पाइपलाइन होर्मुज के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल होती है। लेकिन इसमें परेशानी आने से साफ हुआ कि सिर्फ दूसरा रास्ता तैयार करना काफी नहीं है। उसकी क्षमता और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर से कनेक्टिविटी भी जरूरी है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

दूसरे समुद्री रास्तों पर भी खतरा

MGI के मुताबिक, दुनिया के करीब दो-तिहाई ऊर्जा कारोबार का रास्ता समुद्री चोकपॉइंट्स से होकर गुजरता है।

स्ट्रेट ऑफ मलक्का से रोजाना करीब 2.3 करोड़ बैरल तेल और पेट्रोलियम उत्पाद गुजरते हैं। सुएज कैनाल, बाब अल-मंदेब और पनामा कैनाल भी अहम रास्ते हैं।

इन रास्तों पर संकट आने से जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ सकता है, जिससे परिवहन लागत और समय दोनों बढ़ते हैं।

भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?

भारत बड़े ऊर्जा आयातक देशों में शामिल है। ऐसे में होर्मुज पर संकट आने से देश की तेल और गैस सप्लाई प्रभावित हो सकती है।

MGI के मुताबिक, भारत और चीन का करीब 84% ऊर्जा व्यापार समुद्री चोकपॉइंट्स से होकर गुजरता है।

इसलिए भारत के लिए अलग-अलग देशों से तेल खरीदना, रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व बढ़ाना और वैकल्पिक शिपिंग रूट तैयार रखना अहम हो गया है।

LNG की कीमतों में भी बड़ा उछाल

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होर्मुज संकट के दौरान एशियाई स्पॉट LNG की कीमत करीब 10 डॉलर से बढ़कर 30 डॉलर प्रति MMBtu तक पहुंच गई।

महंगी गैस के कारण भारत समेत कई एशियाई खरीदारों ने कोयले और तेल की ओर रुख किया।

MGI का अनुमान है कि नए उपायों से 2030 तक किसी बड़े संकट की स्थिति में होर्मुज के पहले वाले तेल प्रवाह का करीब 35% से 70% तक कवर किया जा सकता है। हालांकि, पूरी सप्लाई को सुरक्षित रखना अब भी बड़ी चुनौती है।