
रुपये को संभालने में RBI के खजाने पर बढ़ा दबाव! क्या अब और महंगा होगा डॉलर?
डॉलर के मुकाबले रुपये को स्थिर रखने की कोशिश RBI के लिए महंगी साबित हो रही है। ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट में विदेशी मुद्रा भंडार को लेकर चिंता जताई गई है। आखिर रुपये पर दबाव क्यों बढ़ रहा है और किन बदलावों से भारतीय करेंसी को राहत मिल सकती है? जानिए पूरी रिपोर्ट।

In Short
- ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट के मुताबिक, फॉरवर्ड देनदारियां घटाने के बाद RBI का विदेशी मुद्रा भंडार 500 अरब डॉलर से नीचे आने का अनुमान है।
- ईरान युद्ध से महंगा कच्चा तेल, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और अमेरिकी व्यापार नीति की अनिश्चितता रुपये पर दबाव बढ़ा रही है।
- कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट, विदेशी निवेश की वापसी और अमेरिका के साथ ट्रेड डील से रुपये को राहत मिल सकती है।
भारतीय रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक ने डॉलर के मुकाबले रुपये को काफी हद तक स्थिर रखा है, लेकिन इसकी कीमत विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट के रूप में चुकानी पड़ रही है। ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट के अनुसार, अक्टूबर में RBI का विदेशी मुद्रा भंडार फॉरवर्ड देनदारियों को घटाने के बाद 500 अरब डॉलर से नीचे आ गया होगा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि रुपये को लंबे समय तक राहत मिलने के लिए भारत में विदेशी निवेश और व्यापार की स्थिति सुधरना जरूरी है।
रुपये पर दबाव की तीन बड़ी वजहें
रुपये की कमजोरी के पीछे तीन प्रमुख वजहें हैं। पहली ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, दूसरी ग्लोबल AI और सेमीकंडक्टर कंपनियों की तरफ विदेशी निवेशकों का बढ़ता रुझान और तीसरी अमेरिका की व्यापार नीतियों को लेकर अनिश्चितता।
पिछले छह महीनों में रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 94 से 97 के दायरे में रहा है। RBI ने रुपये को संभालने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में दखल दिया, रियायती स्वैप और सट्टेबाजी रोकने वाले कदम उठाए। हालांकि, इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ा और फॉरवर्ड देनदारियां भी बढ़ गईं।
कच्चे तेल की महंगाई ने बढ़ाई मुश्किल
ईरान युद्ध के कारण भारत का तेल आयात बिल बढ़ गया है। साथ ही मध्य पूर्व में व्यापार और वहां से भारत आने वाले पैसे यानी रेमिटेंस पर भी असर पड़ा है।
महंगा तेल देश में महंगाई बढ़ाने के साथ लोगों की खरीदारी की क्षमता पर भी असर डाल रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अगर युद्ध खत्म होता है और कच्चा तेल 70 से 80 डॉलर प्रति बैरल तक आ जाता है, तो रुपये को बड़ी राहत मिल सकती है। लेकिन तेल की कीमत 100 डॉलर के आसपास रहने पर सिर्फ मामूली गिरावट काफी नहीं होगी।

विदेशी निवेशकों ने निकाले 30 अरब डॉलर
इस साल विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 30 अरब डॉलर निकाले हैं। इसकी बड़ी वजह अमेरिका, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे AI और सेमीकंडक्टर से जुड़े बाजारों की तरफ निवेश बढ़ना है।
अगर AI से जुड़े शेयरों में गिरावट आती है और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड घटती है, तो विदेशी निवेश दोबारा भारत की तरफ लौट सकता है। हालांकि, भारतीय कंपनियों की तरफ से शेयर जारी करने और निवेश की गतिविधियां इस साल मजबूत बनी हुई हैं।
अमेरिका से ट्रेड डील दिला सकती है राहत
ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत पर अमेरिका का मौजूदा 10% टैरिफ दूसरे प्रमुख देशों के लगभग बराबर है। लेकिन IT, फार्मा और समुद्री उत्पादों पर संभावित नई पाबंदियों को लेकर चिंता बनी हुई है।
अमेरिका के साथ औपचारिक ट्रेड डील और यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौते का लागू होना रुपये के लिए फायदेमंद हो सकता है।
हालांकि, हालात सुधरने के बाद भी RBI रुपये को तेजी से मजबूत होने देने के बजाय पहले अपना विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने और फॉरवर्ड देनदारियां कम करने पर ध्यान दे सकता है।

