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Solar Power: भारत में बर्बाद हो गई 1.8 अरब यूनिट बिजली! रिकॉर्ड मांग के बावजूद क्यों नहीं हो सका इस्तेमाल?

भारत में एक तरफ बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रही है, तो दूसरी तरफ बड़ी मात्रा में सौर और पवन ऊर्जा का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। CREA की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई और अगस्त में करीब 1.8 अरब यूनिट रिन्यूएबल बिजली का उत्पादन सीमित करना पड़ा। आखिर ऐसा क्यों हुआ और इससे भारत के 2030 के ग्रीन एनर्जी लक्ष्य पर क्या असर पड़ सकता है?

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बिजली की कमी के बावजूद जुलाई और अगस्त में भारत में बड़ी मात्रा में सौर ऊर्जा का इस्तेमाल नहीं हो सका।
बिजली की कमी के बावजूद जुलाई और अगस्त में भारत में बड़ी मात्रा में सौर ऊर्जा का इस्तेमाल नहीं हो सका।

In Short

  • जुलाई और अगस्त में करीब 1.84 अरब यूनिट सौर और पवन ऊर्जा का उत्पादन सीमित करना पड़ा।
  • ग्रिड और ट्रांसमिशन की समस्याओं के कारण करीब 4.2% सौर बिजली का इस्तेमाल नहीं हो सका।
  • भारत का 2030 तक 500 GW रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता हासिल करने का लक्ष्य है।

भारत में सौर ऊर्जा का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन बिजली पहुंचाने के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी एक बड़ी चुनौती बन गई है। जुलाई और अगस्त 2026 के दौरान देश में करीब 1.8 अरब यूनिट रिन्यूएबल बिजली का उत्पादन इस्तेमाल नहीं किया जा सका। हैरानी की बात यह है कि इस दौरान देश में बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर थी और कई जगह बिजली की कमी भी देखने को मिली।

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सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की सोमवार को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई और अगस्त के दौरान कुल सौर ऊर्जा उत्पादन का करीब 4.2% हिस्सा ग्रिड और ट्रांसमिशन से जुड़ी समस्याओं के कारण इस्तेमाल नहीं हो सका। रिपोर्ट में बताया गया कि बिजली उत्पादन की क्षमता बढ़ने के बावजूद उसे जरूरत वाली जगहों तक पहुंचाने की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है।

कितनी बिजली का नहीं हो सका इस्तेमाल?

CREA की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही के जुलाई और अगस्त में कुल 1,835 मिलियन यूनिट (MU) रिन्यूएबल बिजली का उत्पादन सीमित करना पड़ा।

इसमें 1,462 मिलियन यूनिट सौर ऊर्जा और 373 मिलियन यूनिट पवन ऊर्जा शामिल थी। यानी कुल मिलाकर करीब 1.84 अरब यूनिट स्वच्छ बिजली का इस्तेमाल नहीं हो पाया।

इस प्रक्रिया को तकनीकी भाषा में पावर कर्टेलमेंट कहा जाता है। इसका मतलब है कि बिजली उत्पादन की क्षमता मौजूद होने के बावजूद ग्रिड की सीमाओं या संचालन संबंधी समस्याओं के कारण उत्पादन घटाना या रोकना पड़ता है।

2030 तक 500 GW का लक्ष्य, लेकिन सामने बड़ी चुनौती

भारत ने 2030 तक रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता को 500 गीगावाट (GW) तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। रिपोर्ट में देश की मौजूदा क्षमता करीब 304 GW बताई गई है।

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा सौर ऊर्जा उत्पादक देश है। इसके बावजूद बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क तेजी से बढ़ती उत्पादन क्षमता के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहा है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से जून के बीच भी करीब 14% सौर बिजली उत्पादन सीमित करना पड़ा था।

रिकॉर्ड बिजली मांग के दौरान भी क्यों हुई बर्बादी?

जुलाई में भारत की अधिकतम बिजली मांग 270 GW तक पहुंच गई थी। इसी दौरान बिजलीघरों में कोयले का स्टॉक भी तेजी से घटा।

महीने की शुरुआत में देश के करीब आधे कोयला आधारित बिजलीघरों के पास चार दिन से भी कम का कोयला बचा था।

ऐसे समय में सौर और पवन ऊर्जा से मिलने वाली बिजली महत्वपूर्ण हो सकती थी, लेकिन ग्रिड और ट्रांसमिशन की सीमाओं के कारण पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं हो सका।

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ग्रीन एनर्जी बढ़ने के बावजूद कोयले पर निर्भरता

रिपोर्ट के मुताबिक, रिन्यूएबल एनर्जी की क्षमता तेजी से बढ़ने के बावजूद संबंधित तिमाही में देश की करीब दो-तिहाई बिजली कोयले से तैयार हुई।

इसके अलावा अल नीनो मौसम पैटर्न के कारण जलविद्युत उत्पादन में करीब 20% की गिरावट दर्ज की गई। इससे बिजली उत्पादन के लिए जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता और बढ़ गई।

CREA की रिपोर्ट से साफ होता है कि सिर्फ सौर और पवन ऊर्जा उत्पादन की क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को अपने 2030 के ऊर्जा लक्ष्य हासिल करने के लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क और ग्रिड संचालन की व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी, ताकि उत्पादित स्वच्छ बिजली का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल हो सके।