लेबर रिफॉर्म से बढ़ेगी नौकरियां या ऑटोमेशन का खतरा? छोटे कारोबारों के सामने नई चुनौती
भारत में लेबर रिफॉर्म का असर सिर्फ कंपनियों की सुविधा तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि छोटे उद्योगों और रोजगार पर भी पड़ सकता है। आसान नियमों के बीच बढ़ती लागत का दबाव कुछ कारोबारों को ऑटोमेशन की तरफ ले जा सकता है जिससे नौकरियों और मशीनों के बीच नई चुनौती खड़ी हो सकती है।

In Short
- लेबर रिफॉर्म का मकसद वर्कर सुरक्षा और इंडस्ट्री कंपटीटिवनेस बढ़ाना है
- छोटे लेबर इंटेंसिव कारोबारों पर बढ़ती लागत से ऑटोमेशन का दबाव बढ़ सकता है
- एक्सपर्ट्स के मुताबिक भारत को रोजगार वाले सेक्टर और टेक्नोलॉजी ग्रोथ के बीच संतुलन बनाना होगा
भारत में लेबर रिफॉर्म का मकसद कामगारों को बेहतर सुरक्षा देना और उद्योगों के लिए काम करने की प्रक्रिया को आसान बनाना है। सरकार इन बदलावों को रोजगार बढ़ाने और मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम बता रही है, लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इसका असर छोटे और ज्यादा मजदूरों वाले कारोबारों पर अलग तरह से पड़ सकता है। यही वजह है कि इन रिफॉर्म के बाद छोटे उद्योगों में नौकरी और ऑटोमेशन के बीच नई बहस शुरू हो गई है।
लेबर कोड में क्या बदलेगा
बिजनेस टुडे के इंडिया@100 इवेंट में पूर्व लेबर सेक्रेटरी सुमिता दौरा ने कहा कि लेबर कोड को सिर्फ कर्मचारी या उद्योग के पक्ष में नहीं देखा जाना चाहिए। इसका मकसद लेबर वेलफेयर और इंडस्ट्री की कंपटीटिवनेस दोनों को बढ़ाना है।
उन्होंने बताया कि नए नियमों में यूनिवर्सल मिनिमम वेज, सोशल सिक्योरिटी का विस्तार, बेहतर वर्कप्लेस सेफ्टी और काम करने की अच्छी स्थिति जैसे प्रावधान शामिल हैं। इसके साथ ही कंपनियों के लिए सिंगल रजिस्ट्रेशन, सिंगल पैन इंडिया लाइसेंस और सिंगल रिटर्न जैसी सुविधाएं भी होंगी, जिससे कंप्लायंस का बोझ कम हो सकता है।
दौरा के मुताबिक इससे कंपनियों को बाजार की जरूरत के हिसाब से कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने या घटाने में ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी मिल सकती है।
छोटे उद्योगों पर ऑटोमेशन का दबाव
इकोनॉमिस्ट अभिक बरुआ ने कहा कि दुनिया तेजी से ऑटोमेशन की तरफ बढ़ रही है, लेकिन भारत जैसे देश में जहां बड़ी संख्या में लेबर उपलब्ध है, वहां गारमेंट और टॉय जैसे लेबर इंटेंसिव सेक्टर की अभी भी बड़ी भूमिका है।
उन्होंने कहा कि भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रोडक्टिविटी के हिसाब से लेबर की वास्तविक लागत इतनी कम रहे कि कंपनियां ऑटोमेशन की तरफ जल्दी न बढ़ें।
बरुआ ने यह भी सवाल उठाया कि क्या मौजूदा इंसेंटिव लेबर इंटेंसिव सेक्टर को पर्याप्त मदद दे रहे हैं। उनके मुताबिक ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर ज्यादा कैपिटल और टेक्नोलॉजी आधारित हैं, जबकि ज्यादा रोजगार देने वाले सेक्टरों को अलग तरह के सपोर्ट की जरूरत है।
छोटे कारोबारों की सबसे बड़ी चिंता
बरुआ की सबसे बड़ी चिंता छोटे लेबर इंटेंसिव यूनिट्स को लेकर है। उनका कहना है कि छोटे कारोबार, जो पहले कम बेसिक सैलरी स्ट्रक्चर के साथ काम करते थे, उन्हें नए पे-रोल नियमों के कारण बदलाव करना पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि छोटे उद्योगों पर बढ़ती लागत का दबाव उन्हें ज्यादा मशीनों और कम कर्मचारियों वाले मॉडल की तरफ ले जा सकता है। यानी जहां लेबर रिफॉर्म का लक्ष्य रोजगार और सुरक्षा बढ़ाना है, वहीं कुछ छोटे कारोबारों में ऑटोमेशन को बढ़ावा मिलने का खतरा भी बन सकता है।
भारत के लिए संतुलन बनाना जरूरी
भारत के सामने चुनौती यह है कि वह एक तरफ कर्मचारियों को बेहतर अधिकार और सुरक्षा दे, वहीं दूसरी तरफ छोटे उद्योगों के लिए रोजगार पैदा करने की क्षमता भी बनाए रखे।
लेबर रिफॉर्म से नियम आसान हो सकते हैं और उद्योगों को फायदा मिल सकता है, लेकिन यह जरूरी होगा कि लेबर इंटेंसिव सेक्टर को पर्याप्त समर्थन मिले, ताकि विकास के साथ नौकरियों के मौके भी बढ़ते रहें।

