बिगड़ सकता है किचन का बजट! त्योहारों से पहले इतने प्रतिशत तक बढ़ सकती है खाद्य तेलों की कीमतें
रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के हवाले से बताया कि चालू तेल वर्ष (2025-26) में जून 2026 के दौरान भारत में खाद्य तेलों का आयात सालाना आधार पर 29 फीसदी घट गया। इससे बाजार में तेल की उपलब्धता कम होने की आशंका है और इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ सकता है।

त्योहारों का सीजन शुरू होने वाला है और इसी के साथ आम लोगों की जेब पर एक और बोझ बढ़ सकता है। आने वाले दिनों में खाद्य तेलों की कीमतों में बढ़ोतरी होने की आशंका है।
रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के हवाले से बताया कि चालू तेल वर्ष (2025-26) में जून 2026 के दौरान भारत में खाद्य तेलों का आयात सालाना आधार पर 29 फीसदी घट गया। इससे बाजार में तेल की उपलब्धता कम होने की आशंका है और इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ सकता है।
8 से 12 फीसदी तक बढ़ सकते हैं दाम
इस महीने सूरजमुखी तेल का प्राइस इंडेक्स 6 फीसदी तक बढ़ चुका है। इसके बाद उपभोक्ता पाम और सोयाबीन तेल की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे इनकी कीमतों में भी तेजी आ रही है।
एक्सपर्ट का मानना है कि अल-नीनो के प्रभाव, इंडोनेशिया और मलेशिया में बायोफ्यूल के लिए पाम तेल की बढ़ती मांग और अंतरराष्ट्रीय बाजार में सीमित स्टॉक के कारण आने वाले महीनों में सरसों, सोयाबीन, पाम और सूरजमुखी तेल की खुदरा कीमतें 8 से 12 फीसदी तक बढ़ सकती हैं।
मई 2026 में देश ने 13.39 लाख टन खाद्य तेलों का आयात किया था, जो जून में घटकर 11.11 लाख टन रह गया। इस दौरान पाम तेल का आयात 10.5 फीसदी घटकर 4.87 लाख टन रह गया, जबकि सोयाबीन तेल का आयात 23 फीसदी गिरकर 3.81 लाख टन पर आ गया।
इसकी सबसे बड़ी वजह सूरजमुखी तेल की आपूर्ति पर गहराया संकट है। इसके अलावा पाम और सोयाबीन तेल के बाजार में भी तेजी के संकेत मिल रहे हैं। अगर हालात नहीं सुधरे तो त्योहारों के दौरान रसोई का बजट और बिगड़ सकता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध से बढ़ा सूरजमुखी तेल का संकट
दुनिया के कुल सूरजमुखी तेल निर्यात में रूस और यूक्रेन की हिस्सेदारी 63 फीसदी है। यूक्रेन के ड्रोन हमलों के बाद रूस के कई बंदरगाह प्रभावित हुए हैं, जिससे काला सागर का समुद्री मार्ग जहाजों के लिए असुरक्षित हो गया है। इसके कारण कई मालवाहक जहाज रास्ते में फंस गए हैं और भारत आने वाले जहाजों में करीब 60 दिनों तक की देरी हो रही है।
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश सूरजमुखी तेल इसी क्षेत्र से आयात करता है। ऐसे में आपूर्ति प्रभावित होने का असर सीधे घरेलू बाजार पर दिखाई दे सकता है।
कमजोर मानसून भी बना बड़ी वजह
इस साल कमजोर मानसून के कारण तिलहन की बुवाई भी पिछड़ गई है। अब तक 163.54 लाख हेक्टेयर में तिलहन की बुवाई हुई है, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 3.45 फीसदी कम है। जबकि तिलहन का सामान्य रकबा करीब 200 लाख हेक्टेयर होता है। घरेलू उत्पादन कम रहने की आशंका के चलते आयात पर निर्भरता और बढ़ गई है।

