
भारत में बन रहीं इलेक्ट्रिक कारें, फिर बैटरी के लिए चीन पर निर्भर क्यों? सामने आई चौंकाने वाली वजह
भारत में इलेक्ट्रिक कारों और स्कूटरों की बिक्री तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इनकी बैटरी बनाने के मामले में देश अब भी चीन पर निर्भर है। बैटरी सेल का आयात 94 फीसदी बढ़ चुका है। सरकार की ₹18,100 करोड़ की PLI योजना भी उम्मीद के मुताबिक उत्पादन शुरू नहीं करा पाई। अब ₹12,000 करोड़ की नई योजना से क्या बदलेगी तस्वीर?

In Short
- भारत में बैटरी सेल का आयात वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 94% बढ़कर ₹15,721 करोड़ पहुंचा।
- ₹18,100 करोड़ की ACC PLI योजना के बावजूद देश में बड़े पैमाने पर बैटरी सेल उत्पादन शुरू नहीं हो सका।
- सरकार बैटरी के जरूरी कंपोनेंट्स के घरेलू उत्पादन के लिए ₹12,000 करोड़ की नई PLI योजना पर विचार कर रही है।
भारत में इलेक्ट्रिक कारों और स्कूटरों की मांग तेजी से बढ़ रही है। लेकिन इस तेजी के बीच एक परेशानी भी सामने आई है। देश में इलेक्ट्रिक गाड़ियां तो बन रही हैं, मगर उनमें इस्तेमाल होने वाली बैटरी सेल के लिए भारत अब भी बड़े पैमाने पर विदेशों, खासकर चीन पर निर्भर है।
सरकार ने घरेलू बैटरी निर्माण को बढ़ावा देने के लिए पहले ₹18,100 करोड़ की योजना शुरू की थी। इसके बावजूद उत्पादन उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ पाया। अब सरकार बैटरी बनाने में इस्तेमाल होने वाले जरूरी सामान के लिए ₹12,000 करोड़ की नई प्रोत्साहन योजना लाने की तैयारी कर रही है।
EV की मांग बढ़ी, बैटरी सेल का आयात भी उछला
देश में बिकने वाली नई कारों में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की हिस्सेदारी करीब 8 फीसदी और दोपहिया वाहनों में 11 फीसदी तक पहुंच गई है।
वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में बैटरी सेल का आयात 94 फीसदी बढ़कर ₹15,721 करोड़ हो गया।
जुलाई 2026 में आयात 159 फीसदी बढ़कर ₹7,209 करोड़ पहुंच गया। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने ₹41,667 करोड़ की लिथियम-आयन सेल आयात की थीं। इनमें करीब 85 फीसदी हिस्सेदारी चीन की थी।

₹18,100 करोड़ की योजना के बाद भी उत्पादन क्यों पिछड़ा?
सरकार ने मई 2021 में एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC) के लिए ₹18,100 करोड़ की PLI योजना शुरू की थी।
इसके तहत कंपनियों को कुल 40 GWh उत्पादन क्षमता आवंटित की गई, लेकिन बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू नहीं हो सका।
Ola Cell Technologies ने 20 GWh क्षमता हासिल की थी, जबकि अभी केवल 2.5 GWh क्षमता के साथ व्यावसायिक उत्पादन शुरू हुआ है। अब तक किसी बैटरी सेल निर्माता को इस योजना के तहत प्रोत्साहन राशि नहीं मिली है।

भारत में बैटरी बनाना इतना मुश्किल क्यों?
बैटरी सेल बनाने के लिए कैथोड, एनोड, इलेक्ट्रोलाइट और सेपरेटर जैसे कई जरूरी कंपोनेंट्स चाहिए। भारत में इनमें से ज्यादातर सामान का बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं होता। कंपनियों को कच्चे माल और तकनीक के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है।
Himadri Speciality Chemical के CMD अनुराग चौधरी के मुताबिक, जब तक जरूरी कंपोनेंट्स देश में नहीं बनेंगे, तब तक भारत आयातित सामान जोड़कर बैटरी बनाने तक सीमित रहेगा।

भारतीय कंपनियां क्या कर रही हैं?
Amara Raja ने तेलंगाना में 60 MWh क्षमता वाला कस्टमर क्वालिफिकेशन प्लांट शुरू किया है। यहां ग्राहक व्यावसायिक उत्पादन से पहले बैटरी सेल की जांच कर सकेंगे।
कंपनी धीरे-धीरे स्थानीय स्तर पर बने कंपोनेंट्स का इस्तेमाल भी बढ़ा रही है। वहीं, Himadri और Epsilon जैसी कंपनियां बैटरी में इस्तेमाल होने वाले कैथोड और एनोड मटेरियल का घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर काम कर रही हैं।


क्या ₹12,000 करोड़ की नई योजना बदलेगी तस्वीर?
सरकार अब बैटरी सेल के जरूरी कंपोनेंट्स के लिए करीब ₹12,000 करोड़ की नई PLI योजना लाने की तैयारी में है। इसका मकसद देश में कैथोड, एनोड, इलेक्ट्रोलाइट और दूसरे जरूरी सामान का उत्पादन बढ़ाना है।
हालांकि, चुनौती केवल फैक्ट्री लगाने की नहीं है। उद्योग के जानकारों के मुताबिक, भारतीय बैटरी सेल की उत्पादन लागत चीन से आयात होने वाली सेल के मुकाबले करीब 20 फीसदी ज्यादा हो सकती है।
इसके अलावा भारतीय कंपनियों को आधुनिक तकनीक हासिल करने में भी मुश्किलें आ रही हैं।
ऐसे में नई योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत केवल बैटरी सेल बनाने के बजाय उसके कच्चे माल, कंपोनेंट्स और तकनीक की पूरी सप्लाई चेन कितनी तेजी से विकसित कर पाता है।

