मानसून और बाज़ार का रिश्ता कितना खट्टा, कितना मीठा
कृषि और इससे जुड़ सेक्टर देश के सबसे बड़े सेक्टर में से एक हैं, जिनका भारत की ग्रॉस वैल्यू (वित्त वर्ष 2020-21) में 20.19 फीसदी योगदान है।

सामान्य मानसून की संभावनाएं और असल में कितनी बारिश हुई, ये 2 ऐसे मापदंडों यानी पैरामीटर में शामिल हैं, जिन्हें अर्थव्यवस्था और निवेश के एनालिसिस (विश्लेषण) के लिए सबसे अधिक ट्रैक किया जाता है। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की ताकत है। कृषि और इससे जुड़ सेक्टर देश के सबसे बड़े सेक्टर में से एक हैं, जिनका भारत की ग्रॉस वैल्यू (वित्त वर्ष 2020-21) में 20.19 फीसदी योगदान है।
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भारत में जून से सितंबर तक चलते वाले मानसून सीजन की शुरुआत दक्षिण-पश्चिम (साउथ-वेस्ट) मानसून के साथ होती है। साउथ-वेस्ट मानसून इस मौसम में कुल पानी की जरूरतों का करीब 75 फीसदी पूरा करता है। ऐसे में यह खरीफ और रबी दोनों फसलों की खेती के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। खरीफ की फसल का मौसम जुलाई से अक्टूबर तक होता है, जबकि रबी की फसल का मौसम अक्टूबर से मार्च तक होता है। दक्षिण-पश्चिम मानसून न केवल खरीफ की फसलों पर सीधा प्रभाव डालता है बल्कि जलाशयों, झीलों और ग्राउंडवाटर यानी भूजल जैसे जल स्रोतों को फिर से भरने में भी मदद करता है, जिनका उपयोग रबी फसलों की सिंचाई के लिए किया जाता है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इस साल सामान्य मानसून की भविष्यवाणी की है। हालांकि, स्थानिक वितरण से पता चलता है कि उत्तर-पश्चिम भारत के प्रमुख कृषि क्षेत्रों में सीजन की शुरुआत के दौरान बारिश कम हो सकती है, जिससे मौसम शुष्क होने की संभावना है।
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मानसून आपके पोर्टफोलियो पर कैसे डालता है असर?
महंगाई: बारिश का सीधा असर कृषि उपज पर पड़ता है. बारिश चावल, सोयाबीन, मक्का, गन्ना और तिलहन जैसी फसलों की पैदावार को प्रभावित कर सकती है, जिससे खाने पीने की चीजों की महंगाई (फूड इन्फ्लेशन) पर असर पड़ सकता है।
कच्चे माल की कीमतें: अनाज, दालें और फसलें आमतौर पर अलग अलग इंडस्ट्री के लिए कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होते हैं। ऐसे में कृषि उपज पर होने वाला असर कच्चे माल की कीमतों को सीधे प्रभावित कर सकता है।
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बड़ौदा बीएनपी पारिबा म्यूचुअल फंड के सीईओ सुरेश सोनी का कहना है कि रूरल डिमांड और सेंटीमेंट: मानसून का अक्सर रूरल डिमांड (ग्रामीण मांग) और सेंटीमेंट पर सीधा प्रभाव पड़ता है। जिससे उन कंपनियों और सेक्टर के स्टॉक प्राइस पर असर पड़ता है, जो ग्रामीण खपत (रूरल कंजम्पशन) पर निर्भर हैं। मानसून से प्रभावित होने वाले सेक्टर एफएमसीजी, ऑटो-ट्रैक्टर और दोपहिया वाहन, फर्टिलाइजर और पेस्टिसाइड (कीटनाशक) हो सकते हैं।
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
मुंबई में मानसून की बारिश से मौसम कुछ बेहतर हो गया है. जबकि एग्री-इकोनॉमी और बाजार के सेंटीमेंट के लिए मानसून महत्वपूर्ण है, पिछले कुछ सालों में ओवरआल अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव बहुत कम हो गया है।
शेयर बाजार की चाल शायद ही कभी किसी एक फैक्टर की वजह से तय होती है। जैसे, किसी भी दिन बाजार के मूवमेंट के पीछे कई तरह के फैक्टर कारक होते हैं, जिनमें एफआईआई द्वारा किया गया निवेश या बिकवाली, ब्याज दरें, कॉर्पोरेट रिजल्ट, जियो-पॉलिटिकल, मानसून आदि शामिल हैं। पूर्वानुमान लगाने और फिर इनमें से हर फैक्टर पर प्रतिक्रिया करने की कोशिश करने की बजाय, निवेशक अगर अच्छी तरह से परिभाषित फाइनेंशियल प्लानिंग (वित्तीय योजना) बनाकर उस पर कायम रहें तो बेहतर परिणाम मिल सकता है। अपनी फाइनेंशियल प्लानिंग में मदद के लिए किसी वित्तीय सलाहकार से सलाह लें।