₹1.5 लाख की नौकरी छोड़ चुनी ₹75,000 की सैलरी! आधी कमाई के बाद भी Working Mom को क्यों नहीं है अफसोस?
हर महीने ₹1.5 लाख की सैलरी और अच्छी नौकरी के बावजूद एक Working Mom ने ₹75,000 की वर्क फ्रॉम होम जॉब चुन ली। कागज पर यह बड़ा सैलरी कट दिखता है, लेकिन उनके लिए इस फैसले की कीमत सिर्फ पैसों में नहीं थी। जानिए क्यों कई कामकाजी महिलाओं के लिए अब नौकरी का मतलब सिर्फ बड़ी CTC नहीं है।

In Short
- स्वाति ने ₹1.5 लाख की नौकरी छोड़ ₹75,000 की WFH जॉब चुनी।
- कई Working Moms के लिए सैलरी के साथ फ्लेक्सिबिलिटी भी अहम है।
- - वर्क फ्रॉम होम और तय टाइमिंग परिवार संभालने में मदद करती है।
पैसा जरूरी है और करियर भी। लेकिन कई कामकाजी महिलाओं के लिए मां बनने के बाद एक और सवाल अहम हो जाता है कि ज्यादा सैलरी के लिए वे अपने समय, परिवार और बच्चों के साथ कितना समझौता कर सकती हैं?
कई महिलाओं के लिए अच्छी पढ़ाई और सालों का अनुभव होने के बावजूद सबसे ज्यादा सैलरी वाली नौकरी ही पहली पसंद नहीं होती। फ्लेक्सिबल टाइमिंग, वर्क फ्रॉम होम, तय वर्किंग आवर्स, वीकेंड की छुट्टी और बच्चों की देखभाल जैसी सुविधाएं भी नौकरी चुनने में बड़ी भूमिका निभाती हैं।
यह परिवार और करियर में से किसी एक को चुनने की बात नहीं है। कई महिलाओं के लिए असली कोशिश दोनों के बीच सही संतुलन बनाने की है।
₹1.5 लाख से ₹75,000 की सैलरी क्यों चुनी?
स्वाति (बदला हुआ नाम) के पास मास्टर्स डिग्री है। वह दिल्ली-NCR के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में लेक्चरर और टीचर के तौर पर काम कर रही थीं। उनकी सैलरी करीब 1.5 लाख रुपये महीने थी और संस्थान में क्रेच की सुविधा भी मौजूद थी।
लेकिन बेटी के जन्म के बाद हालात बदल गए। उनकी बच्ची क्रेच में एडजस्ट नहीं कर पा रही थी। नवजात बच्ची के साथ नौकरी संभालना मुश्किल होने लगा। घर लौटते-लौटते स्वाति इतनी थक जाती थीं कि बेटी के लिए समय और एनर्जी कम बचते थे।
शुरुआत में उन्होंने दोनों संभालने की कोशिश की लेकिन बाद में नौकरी छोड़ दी।
इसके बाद उन्होंने वर्क फ्रॉम होम वाली नौकरी चुनी, जिसमें उन्हें 75,000 रुपये महीने मिलने लगे। यानी उनकी सैलरी आधी हो गई।
इसके बावजूद स्वाति अपने फैसले से खुश हैं। नई नौकरी में वह बेटी की देखभाल के साथ अपना करियर भी जारी रख पा रही हैं और परिवार को समय दे रही हैं।
कम सैलरी लेकिन ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी
Big Four कंपनियों में से एक में काम करने वाली नई मां Shiwangi Pandey के लिए भी फ्लेक्सिबिलिटी बेहद जरूरी है। उनके मुताबिक कामकाजी माएँ वर्क फ्रॉम होम जैसी सुविधा के लिए बातचीत करती हैं।
हालांकि इसकी एक कीमत भी हो सकती है। अलग टाइम ज़ोन वाले विदेशी क्लाइंट के प्रोजेक्ट पर काम करना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में घरेलू प्रोजेक्ट चुनने के कारण कई अच्छे प्रोजेक्ट हाथ से निकल सकते हैं।
Shiwangi का कहना है कि अनुभव के हिसाब से वह करियर में आगे बढ़ सकती हैं लेकिन फिलहाल छोटे बच्चे की वजह से ज्यादा समय मांगने वाली जिम्मेदारियां लेने से बच रही हैं।
उनके मुताबिक इसका मतलब महत्वाकांक्षा खत्म होना नहीं बल्कि कुछ समय के लिए करियर की रफ्तार धीमी करना है।
नौकरी परिवार के हिसाब से फिट हो तो?
Amity University Noida में APO Dimple Parmar पिछले 18 साल से एक ही संस्थान के साथ हैं। उनके लिए नौकरी में सिर्फ सैलरी नहीं बल्कि घर से दूरी, पांच दिन का वर्किंग वीक और तय 9 से 6 की टाइमिंग भी मायने रखती है।
इसके अलावा बच्चों और यूनिवर्सिटी की छुट्टियों का काफी हद तक एक साथ होना उनके लिए बड़ा फायदा है। ऐसे में सिर्फ ज्यादा सैलरी का ऑफर उन्हें नौकरी बदलने के लिए पर्याप्त नहीं लगता।
बच्चे के साथ समय ज्यादा जरूरी
The Right PR की Kritika Oberoi का बच्चा तीन साल का है। उनके लिए फ्लेक्सिबल टाइमिंग, वर्क फ्रॉम होम और पांच दिन का वर्किंग वीक काफी अहम हैं।

उनका कहना है कि वह कम सैलरी में काम कर सकती हैं लेकिन अपने बच्चे को बड़ा होते देखने का समय नहीं गंवाना चाहतीं। उनके लिए बच्चे के साथ बिताया गया यह समय बाद में ज्यादा पैसा कमाकर वापस नहीं लाया जा सकता।
सिर्फ बच्चों की बात नहीं
Mahila Housing Trust की Alka Sharma के लिए फ्लेक्सिबिलिटी का मतलब बच्चों की देखभाल से ज्यादा स्थिरता और निजी समय है।

करीब 55 साल की उम्र में वह नौकरी का फैसला सिर्फ सैलरी और पद देखकर नहीं करतीं। लंबे वर्किंग आवर्स, ज्यादा सफर और कम फ्लेक्सिबिलिटी किसी ज्यादा सैलरी वाले ऑफर की चमक कम कर सकते हैं।
उनके लिए अब सिक्योरिटी, सरलता और तय शेड्यूल ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
सिर्फ क्रेच होना काफी नहीं
Maternity Benefit Amendment Act 2017 के तहत 50 या उससे ज्यादा कर्मचारियों वाले संस्थानों में तय दूरी के भीतर क्रेच की सुविधा देने का प्रावधान है।
लेकिन स्वाति का मामला बताता है कि सिर्फ क्रेच मौजूद होना हर समस्या का समाधान नहीं है। सुविधा तभी काम की है जब कर्मचारी अपनी परिस्थितियों के हिसाब से उसका इस्तेमाल कर सके।
अब सिर्फ CTC देखकर नौकरी नहीं चुन रहे कर्मचारी
Onsurity की HR Director Saloni Dagly के मुताबिक कर्मचारी अब सिर्फ सैलरी नहीं देखते। फ्लेक्सिबल वर्किंग आवर्स, हाइब्रिड मॉडल, पांच दिन का वर्किंग वीक, पैरेंटल लीव और चाइल्डकेयर सपोर्ट भी नौकरी के पूरे पैकेज का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि महिलाएं हमेशा सैलरी के मुकाबले फ्लेक्सिबिलिटी को ही चुनेंगी। बेहतर सैलरी और करियर ग्रोथ भी कर्मचारियों को बनाए रखने के लिए जरूरी हैं।
फ्लेक्सिबिलिटी की भी है अपनी कीमत
वर्क फ्रॉम होम से बचने वाला सफर का समय, बच्चे के स्कूल कार्यक्रम में शामिल होना या जरूरत पड़ने पर घर से काम करना सैलरी स्लिप में दिखाई नहीं देता। लेकिन कामकाजी माता-पिता के लिए इनकी अपनी आर्थिक और निजी कीमत होती है।
स्वाति ने हर महीने 75,000 रुपये की सैलरी छोड़ी, लेकिन करियर नहीं छोड़ा। उन्होंने ऐसी नौकरी चुनी जिसमें कम कमाई के साथ उन्हें अपनी बेटी और परिवार के लिए ज्यादा समय मिल सके।

