
कर्नाटक हाईकोर्ट ने SC-ST आरक्षण बढ़ाने वाला कानून किया रद्द, 56% आरक्षण पर रोक; अब सुप्रीम कोर्ट जाएगी सरकार?
कर्नाटक हाईकोर्ट ने SC-ST आरक्षण बढ़ाने वाले 2022 के कानून के प्रावधानों को रद्द कर दिया है। अदालत ने 56 प्रतिशत आरक्षण को संवैधानिक सीमा का उल्लंघन बताया है। इस फैसले से सरकारी नौकरियों और शिक्षा के अवसरों पर असर पड़ सकता है। जानिए हाईकोर्ट ने क्या कहा और सरकार का अगला कदम क्या होगा।

In Short
- कर्नाटक हाईकोर्ट ने SC-ST आरक्षण बढ़ाने वाले 2022 के कानून के प्रावधान रद्द किए।
- SC-ST का आरक्षण बढ़ने से राज्य में कुल आरक्षण 50% से 56% हो गया था।
- हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा सकती है कर्नाटक सरकार।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) का आरक्षण बढ़ाने वाले 2022 के कानून को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने बढ़े हुए आरक्षण को रद्द करते हुए कहा कि कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की तय सीमा से ज्यादा नहीं हो सकता। इस कानून के जरिए राज्य में SC का आरक्षण 15 से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और ST का आरक्षण 3 से बढ़ाकर 7 प्रतिशत किया गया था। इससे SC, ST और OBC का कुल आरक्षण 50 से बढ़कर 56 प्रतिशत पहुंच गया था।
हाईकोर्ट ने क्यों रद्द किया बढ़ा हुआ आरक्षण?
मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और जस्टिस के.एस. हेमलेखा की पीठ ने सोमवार को फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि कर्नाटक अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आरक्षण अधिनियम, 2022 की धारा 3 संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करती है।
वहीं, सरकारी नौकरियों में बढ़े हुए आरक्षण से जुड़ी धारा 4 को भी अनुच्छेद 14 और 16 के खिलाफ बताते हुए रद्द कर दिया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि 50 प्रतिशत की सीमा पार करने वाला कानून का हिस्सा असंवैधानिक है।
50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा पर क्या कहा?
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 1992 के इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ मामले का हवाला दिया। इसी फैसले में आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा तय की गई थी, जिसे बाद के कई फैसलों में भी बरकरार रखा गया।

यह फैसला दो याचिकाओं पर आया है। पहली याचिका डॉ. आंबेडकर अनुसूचित जाति महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र कुमार मित्रा ने दाखिल की थी। दूसरी याचिका सागर एच.आर., प्रज्वल कुमार डी. और पुरुषोत्तम गौड़ा जी.एम. ने दायर की थी।
किस सरकार ने बढ़ाया था आरक्षण?
आरक्षण बढ़ाने वाला कानून तत्कालीन मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई की भाजपा सरकार के कार्यकाल में पारित हुआ था। राज्यपाल ने 11 जनवरी 2023 को इसे मंजूरी दी थी और अगले दिन राजपत्र में प्रकाशित किया गया।
इस फैसले के पीछे जस्टिस नागमोहन दास आयोग और न्यायमूर्ति सुभाष बी. आदि की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्टों का हवाला दिया गया था।
क्या सुप्रीम कोर्ट जाएगी कर्नाटक सरकार?
हाईकोर्ट के फैसले पर उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि इसका असर सामाजिक न्याय, शिक्षा और सरकारी नौकरियों पर पड़ सकता है।
परमेश्वर ने पिछली भाजपा सरकार की जिम्मेदारी और केंद्र सरकार की निष्क्रियता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील समेत सभी कानूनी विकल्पों पर विचार करेगी। साथ ही भर्ती प्रक्रियाओं और शिक्षा के अवसरों को कानून के मुताबिक सुरक्षित रखने की कोशिश की जाएगी।

