भारत ने घटाई रूसी तेल की खरीद! अप्रैल में इतना कम हुआ कच्चे तेल का आयात
भारत ने अप्रैल 2026 में कच्चे तेल के आयात में मंथली आधार पर कमी दर्ज की। इसकी बड़ी वजह रही कि Reliance Industries और Nayara Energy ने रूस से तेल खरीद घटा दी। इससे एक महीने पहले भारत ने मॉस्को से रिकॉर्ड मात्रा में तेल खरीदा था।

Russian Oil Imports: भारत ने अप्रैल 2026 में कच्चे तेल के आयात में मंथली आधार पर कमी दर्ज की। इसकी बड़ी वजह रही कि Reliance Industries और Nayara Energy ने रूस से तेल खरीद घटा दी। इससे एक महीने पहले भारत ने मॉस्को से रिकॉर्ड मात्रा में तेल खरीदा था।
फिनलैंड स्थित Centre for Research on Energy and Clean Air (CREA) की रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल में भारत रूसी फॉसिल फ्यूल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार रहा। इस दौरान भारत ने करीब 5 अरब यूरो यानी लगभग 5.82 अरब डॉलर के हाइड्रोकार्बन आयात किए।
रूस से कच्चे तेल की खरीद में गिरावट
भारत की कुल खरीद में कच्चे तेल की हिस्सेदारी 90% रही, जिसकी कीमत करीब 4.5 अरब यूरो रही। इसके अलावा कोयले का आयात 346 मिलियन डॉलर और तेल उत्पादों का आयात 243 मिलियन डॉलर का रहा।
CREA के अनुसार, अप्रैल में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में 3.7% की गिरावट आई। रिपोर्ट में कहा गया कि इसकी मुख्य वजह रूस से आयात में 19.4% की मासिक कमी रही।
जामनगर और वडिनार रिफाइनरियों में रूसी तेल की अनलोडिंग में बड़ा बदलाव देखा गया। वडिनार रिफाइनरी में रूसी आयात करीब 92% और जामनगर में 38% घट गया। वहीं सरकारी इंडियन ऑयल की वडिनार रिफाइनरी में आयात 87% बढ़ा।
मेंटेनेंस और कीमतों का असर
रिपोर्ट के मुताबिक, वडिनार रिफाइनरी में 9 अप्रैल 2026 से मेंटेनेंस शटडाउन शुरू हुआ था। यह रिफाइनरी पूरी तरह रूसी कच्चे तेल पर निर्भर है, इसलिए आयात में तेज गिरावट दर्ज हुई।
दूसरी ओर, सरकारी न्यू मैंगलोर और विशाखापत्तनम रिफाइनरियों ने नवंबर 2025 के बाद मार्च 2026 में फिर से रूसी तेल खरीद शुरू की थी, जो अप्रैल में भी जारी रही। विशाखापत्तनम रिफाइनरी का रूसी आयात 149% बढ़ा।
महंगा हुआ रूसी तेल
CREA ने बताया कि अप्रैल में रूस के यूराल्स क्रूड की औसत कीमत 19% बढ़कर 112.3 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई। यह यूरोपियन यूनियन और ब्रिटेन की नई 44.1 डॉलर प्रति बैरल की प्राइस कैप से दोगुने से भी ज्यादा रही।
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी प्रतिबंधों में राहत बढ़ने के बाद रूसी तेल की मांग तेज हुई, जिससे ब्रेंट क्रूड के मुकाबले यूराल्स क्रूड का डिस्काउंट काफी घट गया। साथ ही लंबे समुद्री रूट, महंगे बीमा और फ्रेट कॉस्ट ने भी कीमतों को ऊपर धकेला।

