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दिल्ली-एनसीआर में बारिश के बाद बाढ़ जैसे हालात, आखिर हर मानसून में क्यों डूबते हैं भारतीय शहर?

दिल्ली-एनसीआर में बारिश के बाद सड़कें जलमग्न और ट्रैफिक बेहाल होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि जब दुनिया के कई ज्यादा बारिश वाले इलाकों में सड़कें ठीक रह सकती हैं, तो भारतीय शहर हर मानसून में पानी के आगे क्यों बेबस नजर आते हैं?

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In Short

  • दिल्ली-एनसीआर में तेज बारिश के बाद कई इलाकों में वॉटरलॉगिंग और ट्रैफिक जाम की समस्या सामने आई, जबकि सफदरजंग में 7 अगस्त को 77.1 मिमी बारिश दर्ज हुई।
  • बारिश के साथ-साथ कमजोर ड्रेनेज सिस्टम, तेजी से बढ़ता कंस्ट्रक्शन, कम होती खुली जमीन और नेचुरल ड्रेनेज रास्तों के खत्म होने से शहरों में फ्लडिंग की समस्या बढ़ रही है।
  • कोलंबो और आयरलैंड के वेस्ट कॉर्क जैसे ज्यादा बारिश वाले इलाकों का उदाहरण बताता है कि समस्या सिर्फ बारिश की मात्रा नहीं, बल्कि शहरों की बारिश संभालने की क्षमता से भी जुड़ी है।

Delhi rain waterlogging: दिल्ली-एनसीआर में तेज बारिश के बाद सड़कें पानी में डूब गईं और कई जगह ट्रैफिक पूरी तरह धीमा पड़ गया। गाड़ियां फंस गईं, लोग घंटों जाम में परेशान रहे और कई पुराने वॉटरलॉगिंग वाले इलाके फिर पानी से भर गए। ऐसे में सोशल मीडिया पर एक सवाल तेजी से उठ रहा है—जब ज्यादा बारिश वाले कोलंबो और आयरलैंड के इलाकों में सड़कें चलने लायक रह सकती हैं, तो भारतीय शहर हर मानसून में क्यों जूझते हैं? इसका जवाब सिर्फ बारिश में नहीं, बल्कि शहरों की तैयारी में भी छिपा है।

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कोलंबो और आयरलैंड का दिया गया उदाहरण

उद्यमी हर्षदीप रापल ने सोशल मीडिया पर कोलंबो का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि उन्होंने 2007 से 2009 के बीच करीब दो साल श्रीलंका के कोलंबो में काम किया था। उनके मुताबिक वहां मई से सितंबर और फिर नवंबर से जनवरी तक तेज बारिश होती है, लेकिन उन्होंने बारिश के कारण सड़कों को भारत की तरह खराब होते नहीं देखा।

वहीं एक अन्य सोशल मीडिया यूजर ने आयरलैंड के वेस्ट कॉर्क की सड़कों का उदाहरण दिया। यहां हर साल करीब 1,200 से 2,800 मिलीमीटर बारिश होती है। इसके बावजूद वहां की छोटी सड़कें डामर की बनी हैं और उनमें बहुत कम गड्ढे दिखाई देते हैं।

असली परेशानी सिर्फ ज्यादा बारिश नहीं

दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में समस्या सिर्फ बारिश की मात्रा नहीं है। शहर तेजी से बढ़े, लेकिन ड्रेनेज सिस्टम और दूसरी सुविधाएं उसी रफ्तार से नहीं बढ़ पाईं। ज्यादा इमारतें, सड़कें और पक्की जमीन होने से बारिश का पानी जमीन में जाने के बजाय सीधे ड्रेनेज सिस्टम की तरफ जाता है।

अगर नालियां बंद हों, छोटी हों या सही तरीके से जुड़ी न हों, तो पानी सड़कों पर वापस आने लगता है। झीलों, वेटलैंड्स और खुले इलाकों के कम होने से पानी के नेचुरल रास्ते भी घट गए हैं।

खराब ड्रेनेज से सड़कें भी होती हैं खराब

पानी अगर सड़क की दरारों और कमजोर हिस्सों में चला जाए तो सड़क जल्दी टूटने लगती है। लंबे समय तक पानी जमा रहने से गड्ढे बढ़ सकते हैं। कई जगह सड़क का स्लोप भी ऐसा होता है कि पानी ड्रेन तक नहीं पहुंच पाता।

ऊपर से बार-बार होने वाली पैचवर्क रिपेयरिंग कुछ समय के लिए सड़क को ठीक कर देती है, लेकिन असली ड्रेनेज समस्या वहीं बनी रहती है।

7 अगस्त को दिल्ली में कितनी बारिश हुई?

दिल्ली के सफदरजंग मौसम केंद्र पर 7 अगस्त को 77.1 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई। अगस्त के पहले सात दिनों में यहां 127 मिलीमीटर बारिश हो चुकी थी और 7 अगस्त की शाम तक अगस्त की कुल बारिश 204.1 मिलीमीटर पहुंच गई।

हालांकि बारिश हर इलाके में एक जैसी नहीं हुई। पुष्प विहार में 111.5 मिलीमीटर, छतरपुर में 104.5 मिलीमीटर, अयानगर में 87.4 मिलीमीटर, पालम में 73.5 मिलीमीटर, जनकपुरी में 68 मिलीमीटर और झरोदा कलां में 67 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई।

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मुंबई और बेंगलुरु की भी यही कहानी

मुंबई में समुद्र के पास होना, ज्यादा आबादी, टाइड और भारी मानसूनी बारिश समस्या को बढ़ाते हैं। वहीं बेंगलुरु में तेजी से बढ़ते कंस्ट्रक्शन ने खुले इलाकों और नेचुरल ड्रेनेज रास्तों को कम किया है। शहर की झीलों और आपस में जुड़े वैली सिस्टम पर भी शहरी विस्तार का असर पड़ा है।

बदलते मौसम के बीच तैयारी जरूरी

क्लाइमेट चेंज के कारण हर जगह बारिश बढ़ेगी, ऐसा जरूरी नहीं है। लेकिन कई इलाकों में बारिश के पैटर्न बदल सकते हैं और कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने की घटनाएं बढ़ सकती हैं। ऐसे में ड्रेनेज सिस्टम को सिर्फ सामान्य बारिश नहीं, बल्कि अचानक होने वाली तेज बारिश को ध्यान में रखकर तैयार करना जरूरी है।

सबसे बड़ी बात यह है कि ये घटनाएं पूरी तरह अचानक नहीं होतीं। अधिकारियों को पता होता है कि कौन सी सड़कें बार-बार डूबती हैं, कहां ड्रेन की सफाई जरूरी है और कौन से अंडरपास खतरनाक हो सकते हैं। आईएमडी भी तेज बारिश की एडवांस वार्निंग देता है। फिर भी हर मानसून वही सिलसिला दोहराता है—बारिश, वॉटरलॉगिंग, ट्रैफिक जाम, इमरजेंसी पंपिंग, सड़क की मरम्मत और फिर अगले मानसून का इंतजार।
 

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