चावल की कीमतों में बड़ी तेजी, बासमती ₹100 किलो के पार पहुंचा, जानिए क्यों बढ़ रहे दाम
देश में चावल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। बासमती चावल के दाम करीब 20% तक बढ़कर ₹100 प्रति किलो पहुंच गए हैं। कम फसल, वेस्ट एशिया से बढ़ी मांग और मजबूत एक्सपोर्ट डिमांड ने कीमतों पर दबाव बढ़ाया है। जानिए क्या त्योहारी सीजन में भी चावल महंगा बना रहेगा।

In Short
- बासमती चावल की कीमतें एक साल में ₹85 से बढ़कर करीब ₹100 किलो पहुंचीं।
- पंजाब हरियाणा में कम फसल और विदेशों से बढ़ी मांग बनी बड़ी वजह।
- भारत ने FY26 में रिकॉर्ड 65.2 लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया।
देश में चावल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। खासतौर पर बासमती और नॉन-बासमती दोनों किस्मों के दाम पिछले कुछ महीनों में काफी बढ़ गए हैं। बासमती चावल की कीमतें वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में पिछले साल की तुलना में 15-20% तक बढ़ गई हैं, जबकि नॉन-बासमती चावल के दाम 20-25% तक चढ़ गए हैं।
बासमती चावल अब करीब ₹100 प्रति किलो के स्तर पर पहुंच गया है, जो एक साल पहले लगभग ₹85 प्रति किलो था। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर चावल इतना महंगा क्यों हो रहा है और क्या आने वाले त्योहारी सीजन में भी कीमतें ऊंची बनी रहेंगी?
फसल कम और विदेशों से बढ़ी मांग ने बढ़ाए दाम
Business Today TV से बातचीत में KRBL लिमिटेड के बल्क एक्सपोर्ट प्रमुख अक्षय गुप्ता ने बताया कि चावल की कीमतों में तेजी के पीछे दो बड़ी वजहें हैं। पहली वजह है फसल की कमी और दूसरी वजह है अंतरराष्ट्रीय बाजार से अचानक बढ़ी मांग।
उन्होंने बताया कि बासमती चावल की कीमतों में तेजी की शुरुआत जनवरी से ही हो गई थी। अक्टूबर-दिसंबर 2025 में आई फसल पंजाब और हरियाणा में शुरुआती बाढ़ से प्रभावित हुई थी, जिससे उत्पादन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा।
अक्षय गुप्ता के मुताबिक, बाजार में जितनी मात्रा की जरूरत थी, उतनी उपलब्धता नहीं हो पाई और इसी वजह से कीमतों में बढ़ोतरी शुरू हुई।
वेस्ट एशिया की मांग ने बढ़ाया दबाव
चावल की कीमतों में तेजी का दूसरा बड़ा कारण वेस्ट एशिया में बढ़ी मांग है। गुप्ता के अनुसार, फरवरी और मार्च के दौरान शुरू हुए पश्चिम एशिया संघर्ष के बाद कई देशों ने अपनी खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने के लिए चावल की खरीद बढ़ा दी।
खासकर खाड़ी देशों की ओर से भारतीय चावल की मांग में तेजी आई। सऊदी अरब भारत के बासमती चावल का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है।
भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में 154 देशों को रिकॉर्ड 65.2 लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया।
क्या कीमतें आगे भी महंगी रहेंगी?
अक्षय गुप्ता का कहना है कि फिलहाल कीमतों में नरमी के संकेत नहीं दिख रहे हैं। नई बासमती फसल की आवक शुरू हो गई है, लेकिन शुरुआती कीमतें पिछले साल की तुलना में ज्यादा हैं।
उन्होंने बताया कि 1509 धान की शुरुआती आवक कीमतें पिछले साल के मुकाबले करीब 20% ज्यादा हैं। हालांकि, अभी फसल की आवक शुरुआती चरण में है और आने वाले समय में ज्यादा मात्रा बाजार में आएगी, जिसके बाद कीमतों की स्थिति साफ होगी।
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है और किसी बड़े देश ने खरीद रोकने के संकेत नहीं दिए हैं। ऐसे में कीमतों पर दबाव जारी रह सकता है।
त्योहारी सीजन में क्या होगा असर?
त्योहारी सीजन नजदीक है, लेकिन नई फसल पूरी तरह बाजार में आने तक चावल की कीमतें स्थिर होने की संभावना कम है। नॉन-बासमती चावल की नई फसल अक्टूबर के मध्य से अंत तक आने की उम्मीद है। इसके बाद ही इसकी कीमतों को लेकर स्थिति स्पष्ट होगी।
बदल रहा है भारतीय चावल का एक्सपोर्ट रूट
बढ़ती वैश्विक मांग के बीच भारतीय चावल के निर्यात का रास्ता भी बदला है। जॉर्डन और तुर्की जैसे देशों को होने वाले निर्यात में तेजी आई है।
हालांकि, गुप्ता के मुताबिक जॉर्डन को निर्यात में आठ गुना बढ़ोतरी का मतलब यह नहीं है कि वहां अचानक बासमती की मांग बहुत बढ़ गई है। उन्होंने बताया कि यह मुख्य रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में आई दिक्कतों के कारण शिपमेंट रूट बदलने का नतीजा है।
इराक को होने वाले निर्यात में करीब 50% गिरावट आई है और कुछ सप्लाई अब जॉर्डन के रास्ते भेजी जा रही है।
क्या नए बाजारों में मांग बनी रहेगी?
अक्षय गुप्ता के मुताबिक, कुछ नए बाजार लंबे समय तक बने रह सकते हैं, लेकिन पिछले साल जैसी असाधारण मांग दोहराना मुश्किल है।
पिछले साल भारतीय बासमती की औसत कीमत करीब 870 डॉलर प्रति टन थी, जिससे विदेशी खरीदारों के लिए भारतीय चावल आकर्षक बना था। इस साल कीमतें ज्यादा होने से कुछ बाजारों में मांग प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा पाकिस्तान की कीमतें भी अहम भूमिका निभाएंगी। अगर पाकिस्तान का बासमती चावल महंगा रहता है तो भारत को फायदा मिल सकता है, लेकिन अगर पाकिस्तान प्रतिस्पर्धी कीमतों पर आता है तो कुछ मांग वापस वहां जा सकती है। स्थिति नवंबर के मध्य तक ज्यादा स्पष्ट होने की उम्मीद है।
