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फ्लाइट में बैठते ही क्यों आती है Airplane Mode ऑन करने की अनाउंसमेंट? जानिए इसके पीछे की असली वजह

5G और आधुनिक तकनीक के दौर में भी फ्लाइट में Airplane Mode ऑन करने का नियम क्यों लागू है? क्या मोबाइल फोन से विमान को कोई खतरा हो सकता है? जानिए एयरलाइंस इस नियम पर आज भी इतना जोर क्यों देती हैं और इसके पीछे की असली वजह क्या है।

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In Short

  • Airplane Mode ऑन करने से फोन मोबाइल नेटवर्क से नहीं जुड़ता।
  • एक फोन से विमान हादसे का कोई सबूत नहीं, फिर भी सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
  • टेकऑफ और लैंडिंग के दौरान Airplane Mode का नियम आज भी लागू है।

Airplane Mode in Flight: हवाई यात्रा के दौरान जैसे ही विमान रनवे पर पहुंचता है, यात्रियों से अनाउंसमेंट के जरिए कहा जाता है कि वे अपने मोबाइल फोन को Airplane Mode पर कर लें। ज्यादातर लोग बिना कुछ सोचे ऐसा कर देते हैं, लेकिन कई लोगों के मन में सवाल आता है कि जब आज 5G और नई टेक्नोलॉजी का दौर है, तब भी यह नियम क्यों लागू है? क्या अगर कोई Airplane Mode ऑन नहीं करता, तो उससे विमान को खतरा हो सकता है? इसका जवाब उतना आसान नहीं है, जितना अक्सर बताया जाता है।

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Airplane Mode कैसे करता है काम

जब आप अपने फोन में Airplane Mode ऑन करते हैं, तो फोन का मोबाइल नेटवर्क बंद हो जाता है। यानी आपका फोन मोबाइल टावर से जुड़ने की कोशिश नहीं करता। हालांकि जरूरत पड़ने पर Wi-Fi और ब्लूटूथ दोबारा चालू किए जा सकते हैं। यही वजह है कि आज कई फ्लाइट्स में Airplane Mode ऑन रहने के बाद भी यात्री इन-फ्लाइट Wi-Fi का इस्तेमाल कर सकते हैं।

एयरलाइंस क्यों देती हैं इस पर जोर?

जब विमान उड़ान भर रहा होता है या लैंड करने वाला होता है, तब वह जमीन के सबसे करीब होता है। अगर उस समय बड़ी संख्या में मोबाइल फोन सामान्य मोड में हों, तो वे बार-बार आसपास के मोबाइल टावर से जुड़ने की कोशिश करते हैं। इससे रेडियो सिग्नल में हल्का शोर बढ़ सकता है।

हालांकि आज के विमान ऐसे सिग्नल को संभालने के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन फिर भी एयरलाइंस और विमानन से जुड़ी एजेंसियां किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहतीं।

क्या एक फोन से विमान को खतरा हो सकता है?

इसका जवाब है नहीं। ऐसा कोई सबूत नहीं है कि किसी एक यात्री का मोबाइल फोन विमान हादसे की वजह बन सकता है। आधुनिक विमान इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से आने वाले ऐसे सिग्नल को संभाल सकते हैं। यही कारण है कि कई देशों में पूरे सफर के दौरान Airplane Mode के साथ फोन इस्तेमाल करने की अनुमति भी दी जाती है।

आखिर क्यों नहीं बदला यह नियम?

आधुनिक विमान मोबाइल से आने वाले सिग्नल को संभाल सकते हैं, लेकिन विमानन में सुरक्षा सबसे पहले रखी जाती है। टेकऑफ और लैंडिंग के दौरान अगर एक साथ कई फोन नेटवर्क खोजने लगें, तो पायलट और एयर ट्रैफिक कंट्रोल की रेडियो बातचीत में हल्की रुकावट आ सकती है। इसी वजह से एयरलाइंस कोई जोखिम नहीं लेना चाहतीं।

कुछ साल पहले 5G C-Band सिग्नल को लेकर भी चिंता जताई गई थी। कहा गया था कि इससे कुछ पुराने विमानों के रेडियो ऑल्टीमीटर पर असर पड़ सकता है। बाद में विमान और टेलीकॉम कंपनियों ने मिलकर जरूरी बदलाव किए। इस पूरे मामले से यह साफ हुआ कि विमानन में छोटी-सी आशंका को भी गंभीरता से लिया जाता है।

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सिर्फ सिग्नल नहीं, सुरक्षा भी है वजह

यूरोप की कुछ एयरलाइंस विमान के अंदर मोबाइल कनेक्टिविटी की सुविधा देती हैं, लेकिन पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि इससे विमान के सिस्टम पर कोई असर न पड़े। यानी तकनीक मौजूद है, लेकिन सुरक्षा जांच के बाद ही इसका इस्तेमाल किया जाता है।

इसके अलावा टेकऑफ और लैंडिंग उड़ान का सबसे अहम समय होता है। अगर इस दौरान कोई आपात स्थिति बन जाए, तो यात्रियों का क्रू की घोषणा सुनना और तुरंत दिए गए निर्देशों का पालन करना जरूरी होता है। यही वजह है कि एयरलाइंस चाहती हैं कि उस समय यात्रियों का पूरा ध्यान मोबाइल की बजाय सुरक्षा पर रहे।