हर साल 1.5 लाख जानवरों पर केमिकल टेस्ट, क्या AI बदल देगा जांच का पूरा तरीका?
यूरोप में हर साल करीब 1.5 लाख जानवरों का इस्तेमाल केमिकल सेफ्टी टेस्टिंग में किया जाता है। अब वैज्ञानिक AI, मानव कोशिकाओं और Organ-on-a-Chip तकनीक के जरिए ऐसा सिस्टम बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जो जानवरों पर निर्भरता कम करे और इंसानों पर असर का बेहतर अनुमान दे सके।

In Short
- EU में हर साल करीब 1.5 लाख जानवर केमिकल टेस्टिंग में इस्तेमाल होते हैं।
- AI और मानव कोशिकाओं की मदद से केमिकल के असर का अनुमान लगाने पर काम चल रहा है।
- Organ-on-a-Chip और Exposure Data को जोड़कर नया सेफ्टी टेस्टिंग सिस्टम तैयार किया जा रहा है।
दशकों से केमिकल की सुरक्षा जांचने के लिए जानवरों पर परीक्षण किया जाता रहा है। लेकिन अब यूरोप के वैज्ञानिक Artificial Intelligence यानी AI, मानव कोशिकाओं और छोटे कृत्रिम अंगों की मदद से इस तरीके को बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
यूरोपीय संघ में हर साल करीब 1.5 लाख जानवरों का इस्तेमाल केमिकल सेफ्टी टेस्टिंग में होता है। इनमें ज्यादातर चूहे होते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तरीका महंगा और समय लेने वाला है, जबकि इसके नतीजे हमेशा इंसानों पर होने वाले असर को सही तरह नहीं बता पाते।
Animal Testing पर क्यों उठ रहे सवाल?
EU के REACH नियमों के तहत कंपनियों को साबित करना होता है कि उनके केमिकल सुरक्षित हैं। साथ ही ‘Three Rs’ सिद्धांत के तहत जहां संभव हो जानवरों की जगह दूसरे तरीके अपनाने, उनकी संख्या कम करने और तकलीफ घटाने पर जोर दिया जाता है।
Vrije Universiteit Brussel के toxicology प्रोफेसर Mathieu Vinken के मुताबिक संभव है कि केवल करीब आधे Animal Tests ही इंसानों में होने वाले असर को सही तरीके से दिखाते हों। लंबे समय तक होने वाले नुकसान की जांच और मुश्किल है। कुछ केमिकल सालों बाद कैंसर, प्रजनन संबंधी परेशानी या अंगों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। चूहों की उम्र कम होने के कारण ऐसे असर को पूरी तरह समझना आसान नहीं होता।
शोधकर्ता John Colbourne के मुताबिक किसी एक पदार्थ की लंबी जांच में तीन से सात साल लग सकते हैं और लागत 15 मिलियन यूरो तक पहुंच सकती है।
AI कैसे मदद करेगा?
वैज्ञानिक New Approach Methodologies यानी NAMs पर काम कर रहे हैं। इसमें मानव कोशिकाओं से मिलने वाला जैविक डेटा AI को दिया जाता है, जो उसमें पैटर्न देखकर अनुमान लगा सकता है कि कोई केमिकल कितना नुकसान पहुंचा सकता है।
इसके साथ Organ-on-a-Chip तकनीक का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। इसमें छोटे उपकरणों के अंदर मानव कोशिकाएं रखी जाती हैं, जो किसी अंग के कुछ काम की नकल करती हैं। इन पर केमिकल का असर देखकर AI यह समझने में मदद कर सकता है कि लीवर, किडनी या दिमाग जैसे अंगों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
PrecisionTox और RISK-HUNT3R पर काम
EU समर्थित PrecisionTox प्रोजेक्ट में करीब 200 केमिकल पर अलग-अलग जीवों और मानव कोशिकाओं की प्रतिक्रिया की तुलना की जा रही है। इसमें 14 प्रयोगशालाएं शामिल हैं।
वहीं RISK-HUNT3R प्रोजेक्ट बिना जानवरों वाले टेस्ट के नतीजों को वास्तविक Exposure Data से जोड़ता है। यह EU के 60 मिलियन यूरो के ASPIS रिसर्च क्लस्टर का हिस्सा है। इस तरीके को 60 केमिकल पर जांचा गया है।
क्या Animal Testing पूरी तरह खत्म हो जाएगी?
फिलहाल ऐसा संभव नहीं माना जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि AI, मानव कोशिकाओं और Organ-on-a-Chip जैसी तकनीकों से जानवरों के इस्तेमाल को काफी कम किया जा सकता है।
यूरोप cosmetics के लिए Animal Testing को पहले ही चरणबद्ध तरीके से खत्म कर चुका है और 2013 में इस दिशा में पूरा मार्केटिंग बैन लागू किया गया था।

