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रोज-रोज पोर्टफोलियो चेक करना पड़ सकता है भारी! कहीं आप भी तो नहीं कर रहे निवेश की ये गलती?

शेयर बाजार में निवेश करने वाले अक्सर सुबह-शाम अपना पोर्टफोलियो चेक करते हैं। लेकिन क्या हर दिन मुनाफा-नुकसान देखना आपकी निवेश रणनीति को बिगाड़ सकता है? एक्सपर्ट्स का कहना है कि बाजार के छोटे उतार-चढ़ाव पर जल्दबाजी में लिया गया फैसला लंबे समय की कमाई पर भारी पड़ सकता है। जानिए कितने दिनों में पोर्टफोलियो चेक करना चाहिए और किन बातों पर ध्यान देना जरूरी है।

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रोजाना पोर्टफोलियो चेक करने की आदत पड़ सकती है भारी, बाजार के उतार-चढ़ाव में जल्दबाजी से निवेशकों को हो सकता है नुकसान। (प्रतीकात्मक तस्वीर)
रोजाना पोर्टफोलियो चेक करने की आदत पड़ सकती है भारी, बाजार के उतार-चढ़ाव में जल्दबाजी से निवेशकों को हो सकता है नुकसान। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

In Short

  • रोज पोर्टफोलियो चेक करने से घबराहट और जल्दबाजी में शेयर बेचने का जोखिम बढ़ सकता है।
  • लंबी अवधि के निवेशकों के लिए साल में 2 से 4 बार समीक्षा पर्याप्त हो सकती है।
  • पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग में एसेट एलोकेशन, वित्तीय लक्ष्य और टैक्स का ध्यान रखना जरूरी है।

शेयर बाजार में निवेश करने वाले ज्यादातर लोग रोजाना अपना पोर्टफोलियो चेक करते हैं। मोबाइल पर ट्रेडिंग ऐप खोलकर यह देखना कि आज कितना मुनाफा हुआ या कितने रुपये का नुकसान, अब आम बात हो गई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रोजाना पोर्टफोलियो देखने की आदत आपकी लंबी अवधि की कमाई पर असर डाल सकती है? वित्तीय जानकारों के मुताबिक, बाजार के हर छोटे उतार-चढ़ाव पर प्रतिक्रिया देना निवेशकों के लिए महंगा साबित हो सकता है।

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भारत में शेयर बाजार में निवेश करना पहले के मुकाबले काफी आसान हो गया है। Zerodha, Groww, Angel One और दूसरे निवेश प्लेटफॉर्म के जरिए लोग कुछ ही सेकंड में अपने शेयर और म्यूचुअल फंड की वैल्यू देख सकते हैं।

लेकिन निवेश की जानकारी आसानी से मिलना और उस जानकारी के आधार पर सही फैसला लेना, दोनों अलग बातें हैं।

रोज पोर्टफोलियो देखने में क्या है खतरा?

अमेरिका में Edward Jones की फाइनेंशियल एडवाइजर जेसिका नीनो के मुताबिक, बार-बार पोर्टफोलियो चेक करने से निवेशकों की चिंता बढ़ सकती है।

इससे लोग अपने लंबी अवधि के वित्तीय लक्ष्यों पर ध्यान देने के बजाय बाजार के रोजमर्रा के उतार-चढ़ाव के आधार पर फैसले लेने लगते हैं।

उनका कहना है कि शेयर बाजार में 5% से 10% तक का उतार-चढ़ाव निवेश की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। हर बार ऐसी गिरावट आने पर पोर्टफोलियो में बदलाव करना जरूरी नहीं होता।

भारतीय बाजार में भी निवेशकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए। निफ्टी और सेंसेक्स में गिरावट आने पर घबराकर शेयर बेचना हमेशा सही रणनीति नहीं होती।

गिरते बाजार में जल्दबाजी से हो सकता है नुकसान

Glassy Mountain Advisors के सीनियर वेल्थ एडवाइजर जॉर्डन स्मिथ के मुताबिक, रोज पोर्टफोलियो देखने का सबसे बड़ा खतरा जानकारी मिलना नहीं, बल्कि उस जानकारी के बाद तुरंत कुछ करने की इच्छा है।

कई निवेशक बाजार की अस्थायी गिरावट और किसी कंपनी की बुनियादी स्थिति में आए बदलाव के बीच अंतर नहीं कर पाते।

मान लीजिए, आपने किसी अच्छी कंपनी के शेयर लंबी अवधि के लिए खरीदे हैं। बाजार में सामान्य गिरावट के कारण शेयर की कीमत कुछ दिनों में नीचे आ जाती है।

अगर आप घबराकर शेयर बेच देते हैं, तो नुकसान वास्तविक हो सकता है। साथ ही भविष्य में संभावित रिकवरी का फायदा भी छूट सकता है।

हालांकि, अगर किसी कंपनी की वित्तीय स्थिति, कारोबार या भविष्य की संभावनाओं में गंभीर गिरावट आई है, तो निवेश की समीक्षा करना जरूरी हो सकता है।

कितने समय में चेक करना चाहिए पोर्टफोलियो?

विशेषज्ञों के मुताबिक, पोर्टफोलियो की समीक्षा कितनी बार करनी चाहिए, यह निवेशक की उम्र, वित्तीय लक्ष्यों और निवेश के प्रकार पर निर्भर करता है।

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निवेशक की स्थिति

समीक्षा की संभावित अवधि

करियर की शुरुआत करने वाले

साल में 2 से 4 बार

करियर के मध्य चरण में

हर 3 या 6 महीने

रिटायरमेंट के करीब या रिटायर हो चुके निवेशक

साल में 1 से 2 बार, परिस्थितियों के अनुसार

ये सामान्य सुझाव हैं, सभी निवेशकों के लिए तय नियम नहीं।

अगर आपने अलग-अलग शेयरों में सीधे निवेश किया है, तो कंपनी के तिमाही नतीजों, महत्वपूर्ण घोषणाओं और कारोबार से जुड़े जोखिमों पर नजर रखना भी जरूरी है।

वहीं, लंबी अवधि के लक्ष्य के लिए SIP के जरिए डायवर्सिफाइड म्यूचुअल फंड में निवेश करने वालों को हर दिन NAV देखने की जरूरत नहीं होती।

पोर्टफोलियो चेक करते समय किन बातों पर दें ध्यान?

विशेषज्ञों के मुताबिक, पोर्टफोलियो की समीक्षा का मतलब सिर्फ यह देखना नहीं है कि कितना मुनाफा या नुकसान हुआ।

सबसे पहले यह जांचना चाहिए कि आपका निवेश अभी भी आपके वित्तीय लक्ष्यों के अनुरूप है या नहीं।

उदाहरण के लिए, अगर आपने अपने पोर्टफोलियो में 60% इक्विटी और 40% डेट रखने का फैसला किया था, लेकिन शेयर बाजार में तेजी के बाद इक्विटी की हिस्सेदारी बढ़कर 65% हो गई है, तो रीबैलेंसिंग पर विचार किया जा सकता है।

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जॉर्डन स्मिथ के मुताबिक, किसी एसेट क्लास का हिस्सा तय लक्ष्य से पांच प्रतिशत अंक से ज्यादा बदलने पर उसकी समीक्षा करना उपयोगी हो सकता है।

हालांकि, रीबैलेंसिंग करते समय टैक्स, ट्रांजैक्शन चार्ज और निवेश की अवधि भी देखनी चाहिए।

नौकरी बदलने या शादी के बाद भी जरूरी है समीक्षा

पोर्टफोलियो में बदलाव सिर्फ शेयर बाजार की चाल के कारण नहीं करना चाहिए।

नौकरी बदलना, शादी होना, घर खरीदने की योजना बनाना या रिटायरमेंट के करीब पहुंचना जैसे जीवन के बड़े बदलाव भी निवेश की रणनीति पर असर डाल सकते हैं।

मसलन, अगर आपको अगले दो साल में घर की डाउन पेमेंट के लिए पैसों की जरूरत है, तो उस रकम को पूरी तरह शेयर बाजार के जोखिम में रखना उचित नहीं हो सकता।

इसी तरह लंबी अवधि के लक्ष्य के लिए निवेश करने वाले व्यक्ति की रणनीति अलग हो सकती है।

भारत में टैक्स का भी रखें ध्यान

भारतीय निवेशकों के लिए पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग के दौरान कैपिटल गेन टैक्स का ध्यान रखना जरूरी है।

शेयर या इक्विटी म्यूचुअल फंड बेचने पर होल्डिंग अवधि और लागू नियमों के अनुसार शॉर्ट टर्म या लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लग सकता है।

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कुछ परिस्थितियों में कैपिटल लॉस को पात्र कैपिटल गेन के खिलाफ समायोजित किया जा सकता है। हालांकि, भारत में इसके लिए निर्धारित शर्तें हैं और हर तरह के नुकसान को हर तरह के मुनाफे से एडजस्ट नहीं किया जा सकता।

इसलिए केवल पोर्टफोलियो का अनुपात ठीक करने के लिए बार-बार खरीद-बिक्री करने से पहले टैक्स का असर समझना चाहिए।

निवेशकों के लिए सबसे जरूरी सबक

शेयर बाजार में पैसा बनाने के लिए सिर्फ अच्छे शेयर या म्यूचुअल फंड चुनना काफी नहीं है। निवेश के दौरान धैर्य बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

रोज पोर्टफोलियो देखने से निवेशक बाजार के छोटे उतार-चढ़ाव को जरूरत से ज्यादा महत्व देने लग सकते हैं। इससे डर या लालच में गलत समय पर खरीद-बिक्री का जोखिम बढ़ जाता है।

हालांकि, इसका मतलब बाजार की खबरों या अपने निवेश को नजरअंदाज करना नहीं है। बेहतर तरीका यह है कि आप अपने लक्ष्यों के मुताबिक नियमित समीक्षा करें, कंपनी या फंड की बुनियादी स्थिति में बदलाव पर ध्यान दें और बिना ठोस वजह के पोर्टफोलियो में बार-बार फेरबदल करने से बचें।

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Disclaimer: ये आर्टिकल सिर्फ जानकारी के लिए है और इसे किसी भी तरह से इंवेस्टमेंट सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। BT Bazaar अपने पाठकों और दर्शकों को पैसों से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकारों से सलाह लेने का सुझाव देता है।