कार लोन लेते समय सिर्फ EMI न देखें, ये गलतियां बना सकती हैं आपकी नई गाड़ी महंगी
कार खरीदने का सपना पूरा करने के लिए लोग अक्सर EMI पर ज्यादा ध्यान देते हैं, लेकिन लोन की कुछ गलतियां बाद में भारी पड़ सकती हैं। लंबी अवधि, ज्यादा ब्याज, हिडन चार्ज और गलत ऑफर चुनने से बचने के लिए जानिए कार लोन लेते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

In Short
- सिर्फ कम EMI देखकर कार लोन लेना पड़ सकता है महंगा, कुल ब्याज और लोन अवधि भी समझना जरूरी है।
- डीलर के पहले लोन ऑफर को स्वीकार करने से पहले बैंक और NBFC की ब्याज दरों की तुलना करें।
- KFS में दिए गए चार्ज, प्री-पेमेंट नियम और कुल लोन लागत को समझकर ही फैसला लें।
कार खरीदते समय ज्यादातर लोग फाइनेंस और लोन लेते वक्त सिर्फ कम EMI पर ध्यान देते हैं। डीलर आसान किस्त बताता है और खरीदार जल्दी फैसला कर लेता है। लेकिन कम EMI कई बार लंबे समय में ज्यादा ब्याज और अतिरिक्त खर्च का कारण बन सकती है। RBI के नए डिस्क्लोजर नियमों के बाद भी लोन की पूरी जानकारी समझना जरूरी है। कार लोन लेते समय कुछ गलतियों से बचना आपकी जेब पर पड़ने वाले बोझ को कम कर सकता है।
सिर्फ EMI देखकर लोन चुनना पड़ सकता है भारी
कार लोन लेते समय सबसे बड़ी गलती यह होती है कि लोग कुल लागत देखने के बजाय केवल मंथली EMI देखते हैं। उदाहरण के लिए 15,000 रुपये की EMI कम लग सकती है, लेकिन अगर लोन की अवधि 3 साल से बढ़ाकर 5 या 7 साल कर दी जाए तो हर महीने की किस्त कम होगी, लेकिन कुल ब्याज ज्यादा देना पड़ेगा। इसलिए लोन लेने से पहले यह जरूर देखें कि आखिर में बैंक को कुल कितनी रकम वापस करनी होगी।
पहला लोन ऑफर स्वीकार करने से पहले करें तुलना
कई खरीदार शोरूम में मिले पहले लोन ऑफर को ही स्वीकार कर लेते हैं। डीलर के पास अलग-अलग बैंकों और NBFCs के साथ टाई-अप होते हैं, लेकिन पहला ऑफर आपके लिए सबसे सस्ता हो यह जरूरी नहीं है। अलग-अलग बैंकों की ब्याज दर, प्रोसेसिंग फीस और दूसरे चार्ज की तुलना करनी चाहिए। ब्याज दर में थोड़ा अंतर भी लंबे समय में हजारों रुपये बचा सकता है।
कम डाउन पेमेंट का मतलब हो सकता है ज्यादा खर्च
कम डाउन पेमेंट करने से शुरुआत में जेब पर कम दबाव पड़ता है, लेकिन इससे लोन की रकम बढ़ जाती है। ज्यादा लोन लेने पर ब्याज भी ज्यादा देना पड़ता है। हालांकि, डाउन पेमेंट बढ़ाने के लिए अपनी पूरी बचत खत्म करना भी सही नहीं है। जरूरी है कि लोन की रकम और इमरजेंसी फंड के बीच सही संतुलन बनाया जाए।
हिडन चार्ज और फाइन प्रिंट जरूर पढ़ें
कई लोग सिर्फ ब्याज दर देखकर लोन फाइनल कर देते हैं और बाकी शर्तों को ध्यान से नहीं पढ़ते। प्रोसेसिंग फीस, डॉक्यूमेंटेशन चार्ज, इंश्योरेंस से जुड़े खर्च और समय से पहले लोन बंद करने के चार्ज लोन को महंगा बना सकते हैं। RBI के नियमों के तहत बैंक और रेगुलेटेड लेंडर्स को KFS यानी की-फैक्ट्स स्टेटमेंट में सभी चार्ज और पेनल्टी की जानकारी देनी होती है।
प्री-पेमेंट और फोरक्लोजर नियमों की जानकारी रखें
कई बार कार खरीदने के बाद आर्थिक स्थिति बदल जाती है और लोग लोन जल्दी खत्म करना चाहते हैं। ऐसे में पहले से यह जानना जरूरी है कि पार्ट-पेमेंट या फोरक्लोजर पर कोई चार्ज लगेगा या नहीं। फिक्स्ड और फ्लोटिंग रेट लोन के नियम अलग हो सकते हैं, इसलिए लोन एग्रीमेंट को ध्यान से पढ़ना जरूरी है।
कार की असली लागत सिर्फ EMI तक सीमित नहीं
कार खरीदने के बाद खर्च सिर्फ EMI और ऑन-रोड कीमत तक नहीं रहता। इंश्योरेंस, फ्यूल, सर्विसिंग, मेंटेनेंस और अचानक आने वाले रिपेयर खर्च भी आपकी जेब पर असर डालते हैं। इसलिए कार लोन लेने से पहले अपनी मासिक आय और दूसरे खर्चों को ध्यान में रखकर बजट बनाना चाहिए।
KFS से समझें लोन की पूरी जानकारी
KFS यानी की-फैक्ट्स स्टेटमेंट एक ऐसा दस्तावेज है जिसमें लोन की रकम, ब्याज दर, APR, प्रोसेसिंग फीस, लेट पेमेंट पेनल्टी और प्री-पेमेंट चार्ज जैसी जानकारी दी जाती है। इसे पढ़ने से ग्राहक समझ सकता है कि उसका लोन वास्तव में कितना महंगा है और वह बेहतर फैसला ले सकता है।

