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26 साल की हार्ट ट्रांसप्लांट सर्वाइवर को दवा के लिए करनी पड़ी जंग, मार्क क्यूबन की मदद से मिली राहत

26 साल की हार्ट ट्रांसप्लांट सर्वाइवर पेयटन हेरेस की जिंदगी बचाने वाली दवा का इंश्योरेंस कवरेज बंद होने से उसकी कीमत $180 से बढ़कर $1,000 हो गई। सोशल मीडिया पर मामला वायरल होने के बाद मार्क क्यूबन की मदद से उन्हें कम कीमत पर दवा मिलनी शुरू हुई।

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In Short

  • 26 साल की पेयटन हेरेस की जरूरी दवा का इंश्योरेंस कवरेज बंद होने के बाद कीमत $180 से बढ़कर $1,000 पहुंच गई।
  • सोशल मीडिया पर मामला वायरल होने के बाद मार्क क्यूबन ने मदद की और उनकी pharmacy ने दवा करीब $300 में उपलब्ध कराई।
  • स्टडी के मुताबिक अमेरिका में कई मरीजों को insurance denial के कारण दवाओं और इलाज की मंजूरी लेने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

6 साल की पेयटन हेरेस ने बचपन में हार्ट ट्रांसप्लांट कराया था। ट्रांसप्लांट के बाद उनके दिल को सुरक्षित रखने के लिए वह जरूरी दवा लेती थीं। लेकिन इंश्योरेंस कंपनी ने इस दवा का खर्च उठाना बंद कर दिया, जिससे उनके सामने इलाज जारी रखने की बड़ी परेशानी खड़ी हो गई।

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जरूरी दवा के लिए शुरू हुई परेशानी

पेयटन हेरेस कई सालों से एवेरोलिमस नाम की दवा ले रही थीं। यह नोवार्टिस की एंटी रिजेक्शन दवा जोर्ट्रेस का जेनेरिक वर्जन है। यह दवा ट्रांसप्लांट के बाद शरीर में नए दिल को सुरक्षित रखने में मदद करती है।

पिछले साल उनकी इंश्योरेंस कंपनी एलिवेंस हेल्थ ने इस दवा को कवर करना बंद कर दिया। इसके बाद हेरेस ने अपनी परेशानी फेसबुक पर शेयर की।उनकी पोस्ट हजारों लोगों ने शेयर की। इसके बाद अगले दिन उनका इंश्योरेंस कवरेज वापस शुरू हो गया लेकिन परेशानी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

180 डॉलर से बढ़कर 1000 डॉलर हुआ दवा का खर्च

पहले हेरेस 90 दिन की दवा के लिए 180 डॉलर देती थीं। लेकिन कवरेज वापस मिलने के बाद भी उन्हें उसी 90 दिन की दवा के लिए 1000 डॉलर देने पड़े।हेरेस ने इसे घोस्ट अप्रूवल बताया। उनका कहना था कि इंश्योरेंस कंपनी ने दवा को मंजूरी तो दे दी लेकिन कीमत इतनी ज्यादा कर दी कि उसे खरीदना उनके लिए मुश्किल हो गया।

सोशल मीडिया से मिली मदद की उम्मीद

हेरेस की कहानी दोबारा चर्चा में आई जब द इंडिपेंडेंट ने मैरी कटर की कहानी प्रकाशित की।मैरी कटर के 24 साल के बेटे की 2012 में मौत हो गई थी। उसके बेटे का दिल हेरेस को ट्रांसप्लांट किया गया था। इसके बाद कटर ने हेरेस की दवा का खर्च उठाने की पेशकश की ताकि वह अपना इलाज जारी रख सकें।

यह कहानी सोशल मीडिया पर तेजी से फैली। इस पोस्ट में एआई स्टार्टअप क्लेमेबल के सीईओ और सह संस्थापक वारिस बोखारी और अरबपति मार्क क्यूबन को टैग किया गया।

मार्क क्यूबन ने की मदद

मार्क क्यूबन ने लिंक्डइन पर हेरेस की पोस्ट का जवाब दिया।उन्होंने कहा कि हार्ट ट्रांसप्लांट को मंजूरी देना लेकिन उसके बाद दिल को सुरक्षित रखने वाली जेनेरिक रिजेक्शन दवा को रोक देना बड़ी समस्या है।

इसके बाद क्यूबन की फार्मेसी ने हेरेस को करीब 300 डॉलर में 90 दिन की दवा उपलब्ध करानी शुरू कर दी।इस खर्च को बोखारी के स्टार्टअप से जुड़े एक गैर लाभकारी संगठन की मदद से पूरा किया जा रहा है।

इंश्योरेंस से जुड़ी बढ़ रही परेशानियां

हेरेस का मामला ऐसे समय सामने आया है जब कई मरीजों को दवाओं और इलाज की मंजूरी लेने में परेशानी हो रही है।हेल्थकेयर कंसल्टिंग कंपनी आईक्यूवीआईए की एक स्टडी के अनुसार 2024 में कमर्शियल इंश्योरेंस वाले 70 प्रतिशत मरीजों की कम से कम एक नई ब्रांडेड दवा की कवरेज को शुरुआत में मना कर दिया गया था।

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करीब एक चौथाई मरीजों को एक साल बाद भी नई दवाओं के लिए मंजूरी नहीं मिल पाई।कॉमनवेल्थ फंड की एक स्टडी में सामने आया कि प्राइवेट इंश्योरेंस वाले कामकाजी उम्र के 21 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उन्हें या उनके परिवार के किसी सदस्य को डॉक्टर की सलाह के बावजूद इलाज देने से मना किया गया।जिन लोगों को इस तरह की परेशानी हुई उनमें करीब 70 प्रतिशत लोगों ने कहा कि इससे उनका खर्च बढ़ गया।

इंश्योरेंस कंपनियां क्यों करती हैं दावा खारिज

इंश्योरेंस क्लेम कई कारणों से खारिज हो सकते हैं। इनमें बिलिंग में गलती, प्रशासनिक समस्या और ऐसा इलाज शामिल है जिसे कंपनी जरूरी नहीं मानती।

अगर इलाज किसी ऐसे डॉक्टर या अस्पताल से कराया गया हो जो इंश्योरेंस नेटवर्क में शामिल नहीं है तो भी क्लेम खारिज किया जा सकता है।हेरेस के मामले में एलिवेंस हेल्थ ने कहा कि दवा को लेकर फैसला लेते समय उनकी एवेरोलिमस इलाज की पूरी जानकारी को ध्यान में नहीं रखा गया था।कंपनी ने यह भी कहा कि यह एक स्पेशल दवा है और इसकी कीमत ज्यादा है।

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क्लेम खारिज होने के बाद मरीज क्या कर सकते हैं

अगर इंश्योरेंस कंपनी किसी दवा या इलाज को मंजूरी नहीं देती है तो मरीज इसके खिलाफ अपील कर सकते हैं।मरीज कंपनी से दोबारा समीक्षा करने की मांग कर सकते हैं। इसके अलावा किसी तीसरे पक्ष से बाहरी समीक्षा भी कराई जा सकती है।

अपील करने से पहले मरीजों को यह समझना चाहिए कि क्लेम क्यों खारिज हुआ और अपनी पॉलिसी से जुड़े सभी दस्तावेज तैयार रखने चाहिए।अगर अपील भी काम नहीं करती है तो राज्य के इंश्योरेंस कमिश्नर के पास शिकायत की जा सकती है।हेरेस के मामले में सिर्फ बचत के पैसे से भी समस्या हल नहीं हो सकती थी क्योंकि हर 90 दिन में 1000 डॉलर की दवा का खर्च उठाना आसान नहीं था।

Disclaimer: ये आर्टिकल सिर्फ जानकारी के लिए है और इसे किसी भी तरह से इंवेस्टमेंट सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। BT Bazaar अपने पाठकों और दर्शकों को पैसों से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकारों से सलाह लेने का सुझाव देता है।