scorecardresearch

Tata Group में अंदरूनी खींचतान के बीच चंद्रशेखरन का बड़ा बयान! बोले- 2-3 साल के मुनाफे से नहीं तय होगा निवेश का भविष्य

टाटा ग्रुप में बड़े निवेश और नेतृत्व को लेकर चल रही खींचतान के बीच चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने कंपनी की रणनीति पर अहम बयान दिया है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने साफ किया कि सेमीकंडक्टर जैसे बड़े प्रोजेक्ट की सफलता केवल दो-तीन साल के मुनाफे से नहीं आंकी जा सकती। आखिर टाटा ग्रुप में किस बात को लेकर मतभेद हैं और कंपनी का आगे का प्लान क्या है? जानिए।

Advertisement
TATA में अंदरूनी खींचतान तेज!
TATA में अंदरूनी खींचतान तेज!

In Short

  • चंद्रशेखरन ने कहा कि सेमीकंडक्टर निवेश को सिर्फ 2-3 साल के रिटर्न से नहीं आंकना चाहिए।
  • ब्लूमबर्ग के मुताबिक, टाटा संस में पूंजी आवंटन और चेयरमैन की नियुक्ति को लेकर मतभेद हैं।
  • टाटा ग्रुप ने भविष्य की वृद्धि के लिए करीब 120 अरब डॉलर के निवेश की योजना बनाई है।

टाटा ग्रुप में निवेश और फैसलों को लेकर चल रही अंदरूनी खींचतान के बीच टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने कंपनी की भविष्य की योजनाओं का बचाव किया है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, चंद्रशेखरन ने कहा कि टाटा ग्रुप भारत और दुनिया की जरूरतों को ध्यान में रखकर निवेश करता रहेगा, भले ही कुछ परियोजनाओं से मुनाफा मिलने में लंबा समय लगे। इनमें सेमीकंडक्टर चिप बनाने जैसी बड़ी परियोजनाएं भी शामिल हैं।

advertisement

मंगलवार को नई दिल्ली में आयोजित Bloomberg New Economy Forum में उन्होंने कहा कि सेमीकंडक्टर परियोजना की सफलता केवल इस आधार पर नहीं आंकी जानी चाहिए कि अगले दो से तीन साल में उससे कितना फायदा होता है। उनके मुताबिक, चिप की जरूरत भविष्य में लगातार बढ़ेगी और भारत के पास इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रतिभा, बाजार और क्षमता मौजूद है।

सेमीकंडक्टर में निवेश पर क्या बोले चंद्रशेखरन?

ब्लूमबर्ग के अनुसार, चंद्रशेखरन ने कहा कि सेमीकंडक्टर और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग में निवेश की दिशा बिल्कुल स्पष्ट है। उन्होंने कहा कि इनकी जरूरत और इन्हें तैयार करने की क्षमता को लेकर भी कोई संदेह नहीं है। टाटा ग्रुप भविष्य की मांग को देखते हुए इन परियोजनाओं पर काम जारी रखना चाहता है।

करीब 160 साल पुराने टाटा ग्रुप ने भविष्य की वृद्धि के लिए लगभग 120 अरब डॉलर के निवेश की योजना बनाई है। इसमें भारत की पहली बड़ी चिप निर्माण इकाई भी शामिल है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस परियोजना को संचालन और जरूरी टेक्नोलॉजी तक पहुंच से जुड़ी देरी का सामना करना पड़ा है।

टाटा ग्रुप में किस बात को लेकर खींचतान?

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा और एन. चंद्रशेखरन के बीच पूंजी के इस्तेमाल और निवेश से मिलने वाले रिटर्न को लेकर मतभेद रहे हैं। नोएल टाटा ऐसी परियोजनाओं पर जोर दे रहे हैं, जिनसे अपेक्षाकृत जल्दी वित्तीय फायदा मिल सके। टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में करीब 66% हिस्सेदारी है।

रिपोर्ट के अनुसार, चेयरमैन पद को लेकर भी विवाद सामने आया है। चंद्रशेखरन ने अगस्त में बोर्ड का सर्वसम्मत समर्थन नहीं मिलने के कारण फरवरी 2027 में कार्यकाल खत्म होने के बाद दोबारा पद नहीं संभालने की बात कही थी। हालांकि, पिछले महीने टाटा संस बोर्ड ने उन्हें पांच साल के लिए फिर नियुक्त किया। नोएल टाटा ने इसके खिलाफ मतदान किया और टाटा ट्रस्ट्स ने नियुक्ति की वैधता पर सवाल उठाए, जबकि टाटा संस ने इस दावे से असहमति जताई है।

मुश्किल हालात के बावजूद ग्रुप का प्रदर्शन

चंद्रशेखरन ने माना कि टाटा ग्रुप को हाल के समय में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। इनमें विमान दुर्घटना, साइबर अटैक और सप्लाई चेन में रुकावटें शामिल हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि इन मुश्किलों के बावजूद ग्रुप ने दोहरे अंकों में वृद्धि दर्ज की और उसका मुनाफा मार्जिन भी बना रहा।

advertisement

उन्होंने कहा कि कंपनी के पुराने फैसले लंबे समय में सही साबित हुए हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि निवेश के मामले में लापरवाही नहीं की जा सकती। ग्रुप को अपनी बैलेंस शीट, बाजार की मांग और वित्तीय स्थिति पर लगातार नजर रखनी होगी।

टेक्नोलॉजी और युद्ध को लेकर भी जताई चिंता

ब्लूमबर्ग के मुताबिक, चंद्रशेखरन ने कहा कि आज की अनिश्चित दुनिया में किसी बड़े निवेश का भविष्य केवल एक्सेल शीट के आंकड़ों से तय नहीं किया जा सकता। कंपनियों को परिस्थितियों के हिसाब से आगे बढ़ना और जरूरत पड़ने पर अपनी रणनीति बदलनी होगी।

जब उनसे सबसे बड़ी चिंताओं के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने गलत लोगों के हाथों में टेक्नोलॉजी पहुंचने, रोजगार के ढांचे में बदलाव और दुनिया में बढ़ते युद्धों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग मोर्चों पर संघर्ष शुरू हो रहे हैं, लेकिन खत्म नहीं हो रहे। ऐसे में किसी बड़े फैसले से गंभीर स्थिति पैदा होने की आशंका उन्हें परेशान करती है।