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अब 18 साल की उम्र में भी बन सकेंगे किसी कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर! पार्लियामेंट्री कमेटी की बड़ी सिफारिश

कंपनी चलाने के नियमों में एक बड़ा बदलाव प्रस्तावित किया गया है, जिससे युवाओं के लिए कॉरपोरेट दुनिया के दरवाजे जल्दी खुल सकते हैं। संसदीय समिति की इस सिफारिश के पीछे क्या वजह है और इसका कंपनियों पर क्या असर पड़ेगा, जानने के लिए पढ़ें पूरी खबर।

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In Short

  • कंपनीज एक्ट में बदलाव की सिफारिश, 21 साल की जगह 18 साल की उम्र में मैनेजिंग डायरेक्टर और होल टाइम डायरेक्टर बनने का रास्ता खुल सकता है।
  • 70 साल की अधिकतम उम्र सीमा बढ़ाकर 75 साल करने का सुझाव, साथ ही इनसॉल्वेंसी मामलों के लिए एनसीएलटी की अलग स्पेशल बेंच बनाने की सिफारिश।
  • फॉरेन कंपनियों को इंडिया वापस लाने के लिए नया लीगल फ्रेमवर्क, जिससे प्रमोटर्स अपनी ऑफशोर कंपनियों को आसानी से वापस ला सकेंगे।

भारत में कंपनी चलाने के नियमों में बड़ा बदलाव प्रस्तावित किया गया है। अगर यह सिफारिश लागू होती है तो 18 साल की उम्र में भी कोई व्यक्ति कंपनी का मैनेजिंग डायरेक्टर या होल टाइम डायरेक्टर बन सकता है। अभी इसके लिए न्यूनतम उम्र 21 साल तय है। यह बदलाव खासकर फैमिली ओन्ड और प्रमोटर लेड कंपनियों में युवा नेतृत्व को बढ़ावा दे सकता है। इस प्रस्ताव के अलावा कंपनी से जुड़े कई और नियमों में बदलाव की सिफारिश की गई है, जिन पर अब चर्चा शुरू हो गई है।

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एमडी और होल टाइम डायरेक्टर बनने की उम्र 21 से घटाकर 18 करने की सिफारिश

कंपनीज एक्ट में बदलाव पर विचार कर रही पार्लियामेंट्री कमेटी ने मैनेजिंग डायरेक्टर और होल टाइम डायरेक्टर बनने की न्यूनतम उम्र 21 साल से घटाकर 18 साल करने की सिफारिश की है। कमेटी का मानना है कि इससे ज्यादा युवा लोग कंपनी के बड़े पदों पर आ सकेंगे और बोर्ड में युवाओं की भागीदारी बढ़ेगी।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, यह बदलाव अमेरिका, सिंगापुर, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के नियमों के करीब लाने की कोशिश है। कमेटी ने 70 साल की अधिकतम उम्र सीमा को बढ़ाकर 75 साल करने का भी सुझाव दिया है। इसके लिए स्पेशल रेजोल्यूशन की जरूरत नहीं होगी।

इनसॉल्वेंसी मामलों के लिए एनसीएलटी की अलग बेंच बनाने का सुझाव

कमेटी ने इनसॉल्वेंसी मामलों को जल्दी निपटाने के लिए एनसीएलटी में स्पेशल बेंच बनाने की सिफारिश की है। कमेटी का कहना है कि केवल इनसॉल्वेंसी मामलों पर ध्यान देने वाली बेंच बनने से आईबीसी मामलों में तय समय सीमा का पालन बेहतर तरीके से हो सकेगा।

इससे कमजोर हो रही कंपनियों के एसेट्स की वैल्यू बचाने में मदद मिलेगी। साथ ही रेगुलर बेंच को मर्जर, कॉरपोरेट रीऑर्गनाइजेशन और कन्वर्जन जैसे सामान्य मामलों पर ज्यादा ध्यान देने का मौका मिलेगा।

फॉरेन कंपनियों को इंडिया वापस लाने के लिए नया फ्रेमवर्क

कमेटी ने फॉरेन कंपनियों को आईएफएससी में आसानी से शिफ्ट करने के लिए कंपनीज एक्ट में नया चैप्टर जोड़ने का सुझाव दिया है। इसमें कंपनियों को अपने होम कंट्री में बंद किए बिना इंडिया में वापस आने की सुविधा मिल सकती है।

कमेटी के मुताबिक, कई इंडियन प्रमोटर्स अपनी ऑफशोर ऑपरेशंस को वापस इंडिया लाना चाहते हैं। इसके लिए टैक्सेशन, कैपिटल गेन्स, स्टांप ड्यूटी, एसेट्स और लायबिलिटीज ट्रांसफर, फाइलिंग और कंप्लायंस जैसे नियमों को आसान बनाने वाला लीगल फ्रेमवर्क जरूरी है।

युवा कॉरपोरेट लीडर्स के लिए खुल सकते हैं नए रास्ते

अगर यह बदलाव लागू होता है तो खासकर फैमिली ओन्ड और प्रमोटर लेड कंपनियों में युवा सक्सेसर्स को जल्दी लीडरशिप रोल मिल सकता है। कई परिवारों में अगली पीढ़ी को कम उम्र से ही बिजनेस की जिम्मेदारी के लिए तैयार किया जाता है।

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हालांकि, सिर्फ उम्र कम करने से ही लीडरशिप तय नहीं होगी। कंपनी चलाने के लिए एक्सपीरियंस, मैच्योरिटी और गुड गवर्नेंस भी उतने ही जरूरी होंगे। इसलिए इस प्रस्ताव पर कॉरपोरेट सेक्टर में समर्थन के साथ बहस भी हो सकती है। फिलहाल यह सिर्फ कमेटी की सिफारिश है और इसे लागू होने के लिए आगे लेजिस्लेटिव प्रोसेस से गुजरना होगा।