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क्या कॉन्शियस रहते हुए कैपिटलिस्ट भी बन सकते हैं? Nandi Ji ने बताया पैसा कैसे बन सकता है धर्म निभाने की ताकत

आधुनिक कॉरपोरेट दुनिया में जाति या समुदाय से ज्यादा मेरिट और परफॉर्मेंस मायने रखते हैं। Nandi Ji के मुताबिक व्यक्ति को अपनी सीमित पहचान से ऊपर उठकर क्षमताओं और चेतना पर फोकस करना चाहिए। उन्होंने पैसे को एनर्जी बताते हुए कहा कि समृद्धि जिम्मेदारी और धर्म निभाने का साधन भी बन सकती है।

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भारत में बिजनेस और समाज को लंबे समय तक जाति, समुदाय और पारंपरिक भूमिकाओं के नजरिए से भी देखा गया है। लेकिन आधुनिक कॉरपोरेट दुनिया में किसी व्यक्ति की पहचान से ज्यादा उसकी क्षमता, मेरिट और परफॉर्मेंस मायने रखती है। इसी संदर्भ में Nandi Ji ने समझाया कि युवा बिजनेस प्रोफेशनल को मुश्किल समय में अपनी भावनात्मक ताकत कहां से लेनी चाहिए और पैसा तथा धर्म को किस नजरिए से देखना चाहिए।

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'हम सभी भूमिकाओं का हिस्सा हैं'

Nandi Ji के मुताबिक जब व्यक्ति अपनी सीमित पहचान से ऊपर उठता है, तो वह खुद को सिर्फ एक जाति या सामाजिक भूमिका तक सीमित नहीं देखता। उन्होंने कहा कि व्यक्ति में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र से जुड़ी अलग-अलग क्षमताएं एक साथ मौजूद हो सकती हैं।

उनके अनुसार यही वह स्थिति है, जहां व्यक्ति अपनी वास्तविक क्षमताओं को समझना शुरू करता है। जब ये क्षमताएं ज्यादा विकसित चेतना के साथ बढ़ती हैं, तो व्यक्ति में लीडरशिप की ताकत भी मजबूत होती है।

लीडरशिप में पूरी तस्वीर देखना जरूरी

Nandi Ji ने कहा कि लीडरशिप की शुरुआत खुद को और अपनी पूरी गतिविधि को एक साथ देखने से होती है। कोई व्यक्ति सिर्फ एक तरह की स्किल या भूमिका के जरिए अच्छा लीडर नहीं बनता।

उनका कहना था कि अलग-अलग क्षमताओं का मेल ही मजबूत लीडर तैयार करता है। यही सोच आधुनिक कॉरपोरेट दुनिया में भी लागू होती है, जहां किसी व्यक्ति की जाति या पारंपरिक पृष्ठभूमि से ज्यादा उसका काम और क्षमता अहम होती है।

धर्म के अलग रास्ते लेकिन मकसद चेतना

अलग-अलग धर्मों में पैसा, ब्याज और व्यापार को लेकर अलग नजरिए होने पर Nandi Ji ने कहा कि चेतना की ओर ले जाने वाले सभी रास्तों का सम्मान होना चाहिए।

हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि किसी भी धार्मिक रास्ते की सार्थकता इस बात से तय होती है कि उसमें चेतना का स्तर और उसका कंटेंट क्या है। यानी सिर्फ रास्ता अलग होना अहम नहीं है, बल्कि वह व्यक्ति की सोच और समझ को किस दिशा में ले जाता है, यह ज्यादा जरूरी है।

क्या Conscious और Capitalist दोनों हो सकते हैं?

इस सवाल पर Nandi Ji ने कहा कि चेतना और पूंजीवाद एक-दूसरे के विरोधी होना जरूरी नहीं है। उनके मुताबिक पैसा सिर्फ कमाई का जरिया नहीं बल्कि एक तरह की एनर्जी भी है।

अगर किसी व्यक्ति के पास पैसा और समृद्धि है, तो वह उसका इस्तेमाल अपने धर्म यानी जिम्मेदारी निभाने में कर सकता है। जहां जरूरत हो वहां संसाधन देना, दूसरों की मदद करना और अपनी जिम्मेदारियां पूरी करना भी इसी सोच का हिस्सा है।

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समृद्धि से मिल सकती है ज्यादा स्वतंत्रता

Nandi Ji के मुताबिक आर्थिक समृद्धि व्यक्ति को कई तरह की स्वतंत्रता भी देती है। पैसा होने से वह अपने जरूरी काम पूरे कर सकता है और उन क्षेत्रों में संसाधन लगा सकता है, जिन्हें वह महत्वपूर्ण मानता है।

युवा बिजनेस प्रोफेशनल्स के लिए उनका संदेश यही रहा कि भावनात्मक मजबूती किसी जाति या तय पहचान से नहीं बल्कि अपनी क्षमताओं, चेतना और उद्देश्य को समझने से आनी चाहिए। इस नजरिए में पैसा लक्ष्य भर नहीं बल्कि जिम्मेदारी और धर्म निभाने का साधन भी बन सकता है।