यूरिया सब्सिडी पर सरकार का बड़ा फैसला, बढ़ते खर्च के बीच बदल सकती है दशकों पुरानी नीति
भारत में यूरिया सब्सिडी का बढ़ता बोझ और महंगी खरीद सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। अब सरकार यूरिया के ज्यादा इस्तेमाल को कम करने, नई वितरण व्यवस्था लागू करने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने की तैयारी कर रही है। इसका सीधा असर किसानों और खेती की लागत पर पड़ सकता है।

In Short
- बढ़ती यूरिया लागत और महंगे आयात से सरकार पर बढ़ा सब्सिडी का दबाव
- सस्ती यूरिया की वजह से बढ़ा इस्तेमाल अब मिट्टी की सेहत पर डाल रहा असर
- 40 जिलों में नई यूरिया बुकिंग व्यवस्था की टेस्टिंग शुरू, उत्पादन बढ़ाने की तैयारी
भारत में बढ़ती यूरिया लागत और दुनियाभर में फर्टिलाइजर सप्लाई की परेशानी ने सरकार को दशकों पुरानी सब्सिडी व्यवस्था पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार अब यूरिया के ज्यादा इस्तेमाल को कम करने और खेती में फर्टिलाइजर के संतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है। क्योंकि महंगी खरीद, बढ़ता सब्सिडी खर्च और विदेशी मुद्रा पर दबाव ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। इसी वजह से अब यूरिया के इस्तेमाल और सप्लाई व्यवस्था में बदलाव की तैयारी की जा रही है।
महंगी खरीद और बढ़ता सब्सिडी खर्च बनी बड़ी चुनौती
भारत दुनिया के सबसे बड़े यूरिया खरीदारों में शामिल है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान युद्ध के कारण दुनियाभर में फर्टिलाइजर और ऊर्जा सप्लाई प्रभावित हुई, जिससे यूरिया खरीद की लागत काफी बढ़ गई। अप्रैल में हुई खरीद में भारत को युद्ध से पहले की कीमतों के मुकाबले करीब दोगुनी कीमत चुकानी पड़ी।
सरकार के एक अधिकारी के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष में भारत का फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल 3 ट्रिलियन रुपये यानी करीब 31 अरब डॉलर से ज्यादा जा सकता है, जबकि बजट में इसके लिए 1.71 ट्रिलियन रुपये का प्रावधान किया गया था।
सस्ती यूरिया से बढ़ा इस्तेमाल
सरकार की सब्सिडी व्यवस्था के कारण किसानों को यूरिया काफी कम कीमत पर मिलता है। किसानों को 45 किलोग्राम की यूरिया बोरी के लिए सिर्फ 266.5 रुपये देने पड़ते हैं, जो सरकार की खरीद कीमत के दसवें हिस्से से भी कम है।
सस्ती कीमतों की वजह से भारत में यूरिया का इस्तेमाल काफी बढ़ गया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत के किसान अमेरिका और ब्राजील दोनों देशों के किसानों से ज्यादा यूरिया का इस्तेमाल करते हैं।
ज्यादा यूरिया इस्तेमाल से मिट्टी की सेहत पर असर
सरकार अब किसानों को ज्यादा यूरिया इस्तेमाल के नुकसान समझाने की कोशिश कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि जरूरत से ज्यादा फर्टिलाइजर इस्तेमाल करने से मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो रही है और खेती की लागत भी बढ़ रही है।
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 सीजन में जांच किए गए 90 लाख से ज्यादा मिट्टी के नमूनों में आधे से ज्यादा में ऑर्गेनिक कार्बन का स्तर कम मिला, जो मिट्टी की उर्वरता का अहम संकेत माना जाता है।
किसानों के लिए यूरिया सप्लाई पर भी असर
खेती के बड़े सीजन में यूरिया की मांग बढ़ जाती है। ऐसे समय में कुछ राज्यों में सहकारी संस्थाएं सप्लाई सीमित कर रही हैं। पंजाब के किसान सुखबीर राम ने बताया कि उन्हें जरूरत के मुकाबले कम यूरिया मिला।
उन्होंने बताया कि धान की खेती के लिए उन्हें प्रति एकड़ चार से पांच 45 किलोग्राम की यूरिया बोरी चाहिए, लेकिन उन्हें सिर्फ तीन बोरी ही मिल पाई। बाकी जरूरत पूरी करने के लिए उन्हें निजी विक्रेताओं से खरीद करनी पड़ सकती है।
नई वितरण व्यवस्था की हो रही टेस्टिंग
सरकार अब यूरिया वितरण के लिए नई व्यवस्था का परीक्षण कर रही है। 40 जिलों में एक नया सिस्टम शुरू किया गया है, जिसमें किसान अपनी जमीन और बोई गई फसल के आधार पर पहले से यूरिया बुक कर सकेंगे।
इस व्यवस्था का उद्देश्य जरूरत के हिसाब से यूरिया उपलब्ध कराना और ज्यादा इस्तेमाल को नियंत्रित करना है।
उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता घटाने की तैयारी
सरकार ने यूरिया उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए एक नए कार्यक्रम को मंजूरी दी है। इसके तहत भारत की सालाना यूरिया उत्पादन क्षमता में 10 मिलियन टन की बढ़ोतरी करने का लक्ष्य रखा गया है, जो मौजूदा क्षमता से करीब एक तिहाई ज्यादा होगी।
हालांकि, मौसम की स्थिति भी किसानों के लिए चिंता बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, कम बारिश और दुनियाभर में फर्टिलाइजर सप्लाई की परेशानी का असर खेती और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है।सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा बनाए रखते हुए यूरिया सब्सिडी के बढ़ते बोझ को नियंत्रित करना है।

