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BT India @ 100: भारत की मैन्युफैक्चरिंग ताकत तेजी से बढ़ी, संजीव सान्याल ने 16% GDP सवाल पर दिया जवाब

भारत की मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ को सिर्फ जीडीपी में उसकी हिस्सेदारी से आंकना सही नहीं है। संजीव सान्याल का कहना है कि स्टील, मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में भारत की क्षमता तेजी से बढ़ी है। अब शिपबिल्डिंग और नई टेक्नोलॉजी देश के लिए अगला बड़ा मौका बन सकती है।

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BT India @ 100: भारत में मैन्युफैक्चरिंग की प्रगति को सिर्फ जीडीपी में उसकी हिस्सेदारी के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर भी उसके साथ आगे बढ़ रहा है।

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Business Today India@100 सेशन में बिजनेस टुडे के सिद्धार्थ जराबी से बातचीत के दौरान संजीव सान्याल ने कहा कि भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता एक दशक पहले के मुकाबले काफी बड़ी हो चुकी है।

16 फीसदी हिस्सेदारी पर क्या बोले सान्याल?

मैन्युफैक्चरिंग की जीडीपी में हिस्सेदारी करीब 16 फीसदी रहने से जुड़े सवाल पर सान्याल ने कहा कि सिर्फ इस अनुपात को देखकर यह कहना सही नहीं होगा कि सेक्टर आगे नहीं बढ़ रहा है।

उनका कहना है कि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी लगभग स्थिर है तो इसका मतलब है कि यह सेक्टर भी बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में मैन्युफैक्चरिंग का आकार और उसकी बनावट दोनों बदले हैं।

स्टील से मोबाइल फोन तक बढ़ी ताकत

सान्याल ने स्टील, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोलर पैनल मैन्युफैक्चरिंग का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि चीन सालाना करीब 960 मिलियन टन स्टील बनाता है, जबकि भारत करीब 160 मिलियन टन उत्पादन के साथ दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्टील उत्पादक है। अमेरिका का उत्पादन करीब 80 मिलियन टन है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन उत्पादक है, जबकि करीब एक दशक पहले यह सेक्टर देश में बहुत छोटा था।

शिपबिल्डिंग में दिख रहा बड़ा मौका

सान्याल ने शिपबिल्डिंग को भारत के लिए अगला बड़ा अवसर बताया। उनके मुताबिक, भारत के पास स्टील, युवा वर्कफोर्स, लंबी समुद्री तटरेखा, डिजाइन क्षमता और घरेलू मांग मौजूद है।

उन्होंने कहा कि भारत के 90 फीसदी से ज्यादा आयात और निर्यात विदेशी जहाजों से होते हैं, जिसे उन्होंने बड़ी भू-राजनीतिक कमजोरी बताया।

सान्याल के मुताबिक, शिपिंग को इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा देने और लंबी अवधि की फाइनेंसिंग आसान करने जैसे बदलावों का असर दिखने लगा है। भारतीय शिपयार्ड को कई साल आगे तक के ऑर्डर मिल रहे हैं और हुंडई तथा मित्सुबिशी जैसी कंपनियों ने भी भारत में जहाज बनाने में दिलचस्पी दिखाई है।

सिर्फ विदेशी टेक्नोलॉजी के भरोसे नहीं चलेगा काम

सान्याल ने कहा कि कोविड और दूसरी रुकावटों के बाद ग्लोबल सप्लाई चेन का तरीका भी बदला है। अब कंपनियां सिर्फ जरूरत के समय सप्लाई मिलने के बजाय संभावित जोखिमों के लिए पहले से तैयारी कर रही हैं।

उन्होंने कहा कि भारत को केवल टेक्नोलॉजी आयात करने या जॉइंट वेंचर पर निर्भर रहने के बजाय नई टेक्नोलॉजी खुद बनाने का आत्मविश्वास विकसित करना होगा। उनके मुताबिक, भविष्य की मैन्युफैक्चरिंग के लिए इनोवेशन, रिसर्च और जोखिम लेने की सोच भी जरूरी होगी।
 

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