भारत की जीडीपी के बेस ईयर में बदलाव, ग्रोथ के आंकड़े क्यों बदले? जानिए पूरी वजह
भारत के GDP आंकड़ों में बदलाव को लेकर उठ रहे सवालों के बीच सरकार ने बेस ईयर रिवीजन का पूरा गणित समझाया है। सांख्यिकी मंत्रालय के सचिव सौरभ गर्ग ने बताया कि पुरानी और नई GDP सीरीज की सीधी तुलना क्यों भ्रामक हो सकती है और आखिर बेस ईयर बदलने की जरूरत क्यों पड़ती है।

In Short
- भारत में GDP का बेस ईयर अब 2022-23 किया गया है, इससे पहले यह 2011-12 था।
- सरकार के मुताबिक अर्थव्यवस्था की बदलती संरचना, बेहतर डेटा और नए सांख्यिकीय तरीके बेस ईयर बदलने की बड़ी वजह हैं।
- सौरभ गर्ग ने कहा कि पुरानी और नई GDP सीरीज की तुलना करते समय “apples to apples” का सिद्धांत जरूरी है।
भारत के GDP आंकड़ों को लेकर चल रही बहस के बीच बिजनेस टुडे के एक शो में ग्रुप एडिटर सिद्धार्थ ज़राबी के सवालों का जवाब देते हुए MoSPI सचिव सौरभ गर्ग ने कहा कि असली मुद्दा ग्रोथ के कैलकुलेशन से ज्यादा अलग-अलग GDP सीरीज की तुलना से जुड़ा है। उनका कहना है कि जब GDP का बेस ईयर बदलता है, तो पुरानी और नई सीरीज के आंकड़ों की सीधे तुलना करना सही तस्वीर नहीं देता।
GDP में बेस ईयर क्यों जरूरी है?
सौरभ गर्ग के मुताबिक GDP की गणना हमेशा किसी एक बेस ईयर के आधार पर की जाती है। समय के साथ अर्थव्यवस्था बदलती रहती है, इसलिए बेस ईयर में भी बदलाव करना जरूरी हो जाता है।
भारत में पहले भी कई बार GDP का बेस ईयर बदला गया है। यह 1993-94 से बदलकर 1999-2000 हुआ, इसके बाद 2004-05 और फिर 2011-12 किया गया। अब इसे बदलकर 2022-23 किया गया है।
गर्ग का कहना है कि यह प्रक्रिया भारत के लिए नई नहीं है और समय-समय पर ऐसा पहले भी होता रहा है।
बेस ईयर बदलने के पीछे तीन बड़ी वजह
गर्ग ने GDP के बेस ईयर में बदलाव के पीछे तीन मुख्य कारण बताए हैं-
पहला कारण अर्थव्यवस्था की बदलती तस्वीर है। समय के साथ कुछ प्रोडक्ट और सेक्टर अपना महत्व खो देते हैं, जबकि इलेक्ट्रॉनिक्स और डिजिटल सेक्टर जैसे नए क्षेत्र ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं। ऐसे में पुराने बेस ईयर के आधार पर मौजूदा अर्थव्यवस्था को पूरी तरह समझना मुश्किल हो सकता है।
दूसरा कारण सांख्यिकीय तरीकों में बदलाव है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर IMF और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं के फ्रेमवर्क के मुताबिक समय के साथ डेटा मापने के तरीके भी अपडेट होते रहते हैं।
तीसरी वजह ज्यादा और बेहतर डेटा की उपलब्धता है। GST रिकॉर्ड, बढ़ती डिजिटाइजेशन और पब्लिक फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम जैसे स्रोतों से अब पहले की तुलना में ज्यादा विस्तृत जानकारी मिलती है। गर्ग के मुताबिक अब खर्च से जुड़ा डेटा गांव के स्तर तक ट्रैक किया जा सकता है।
पुरानी और नई GDP सीरीज की तुलना क्यों गलत हो सकती है?
सौरभ गर्ग ने इसे समझाते हुए कहा कि तुलना करते समय “apples to apples” की तुलना होनी चाहिए, न कि “apples to oranges” की।
उनका कहना है कि बेस ईयर बदलने के साथ GDP और उसके अलग-अलग हिस्सों का स्तर भी बदल सकता है। ऐसे में पुरानी सीरीज के किसी तिमाही आंकड़े को नई सीरीज के आंकड़े से सीधे जोड़कर ग्रोथ निकालने पर नतीजा ज्यादा या कम दिखाई दे सकता है।
GDP बहस में क्या है मुख्य बात?
GDP डेटा को लेकर बहस सिर्फ ग्रोथ के आंकड़े तक सीमित नहीं है। सवाल इस बात का भी है कि आंकड़ों को किस फ्रेमवर्क में देखा जा रहा है।
गर्ग का कहना है कि बेस ईयर में बदलाव का मकसद अर्थव्यवस्था में आए बदलाव, नए सांख्यिकीय तरीकों और बेहतर डेटा को शामिल करना है। ऐसे में GDP पर किसी भी बहस के लिए जरूरी है कि तुलना एक जैसी सांख्यिकीय सीरीज के आधार पर की जाए।

