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महंगा कच्चा माल, सीमित कीमत बढ़ोतरी और निगेटिव Deflator...मैन्यूफैक्चरिंग जीडीपी के आंकड़ों का समझें पूरा गणित

भारत की GDP बहस के बीच मैन्युफैक्चरिंग में नेगेटिव डिफ्लेटर पर सवाल उठ रहे हैं। बिजनेस टुडे के एक शो में MoSPI सचिव सौरभ गर्ग ने बताया कि बढ़ती इनपुट कॉस्ट, सीमित प्राइसिंग पावर और घटती Value Addition की वजह से यह स्थिति बन सकती है।

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In Short

  • महंगाई के बीच मैन्युफैक्चरिंग में नेगेटिव डिफ्लेटर क्यों दिखा? MoSPI सचिव सौरभ गर्ग ने समझाया पूरा गणित।
  • कच्चा माल महंगा हुआ, लेकिन कंपनियां बढ़ी लागत ग्राहकों पर नहीं डाल पाईं, जिससे फैक्ट्री स्तर पर Value Addition घटा।

भारत की GDP ग्रोथ को लेकर चल रही बहस अब एक तकनीकी लेकिन अहम सवाल पर पहुंच गई है। सवाल यह है कि जब महंगाई ऊंची बनी हुई है तो मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में डिफ्लेटर नेगेटिव कैसे हो सकता है। बिजनेस टुडे के एक शो में ग्रुप एडिटर सिद्धार्थ ज़राबी के सवालों का जवाब देते हुए MoSPI सचिव सौरभ गर्ग के मुताबिक इसकी बड़ी वजह फैक्ट्रियों पर बढ़ता लागत दबाव है। कंपनियों के इनपुट की कीमत तेजी से बढ़ी है लेकिन वे पूरी लागत ग्राहकों पर नहीं डाल पा रही हैं।

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क्या है Double Deflation का मामला

सौरभ गर्ग ने मैन्युफैक्चरिंग के आंकड़ों को समझाते हुए कहा कि यहां Double Deflation का तरीका इस्तेमाल किया जाता है। इसमें इनपुट और आउटपुट दोनों पर कीमतों के असर को अलग-अलग हटाकर वास्तविक ग्रोथ का अनुमान लगाया जाता है।

यही वजह है कि कई बार मैन्युफैक्चरिंग के आंकड़े सामान्य महंगाई के ट्रेंड से अलग दिख सकते हैं।

कच्चा माल महंगा लेकिन कंपनियों की कीमत बढ़ाने की क्षमता सीमित

गर्ग के मुताबिक हाल के महीनों में कंपनियों के लिए इनपुट कॉस्ट काफी बढ़ी है। इसमें स्टील जैसे मिनरल आधारित उत्पाद और पेट्रोलियम से जुड़े प्लास्टिक तथा कंपोजिट जैसे सामान शामिल हैं।

लेकिन कंपनियां इन बढ़ी हुई कीमतों को पूरी तरह अंतिम ग्राहक तक नहीं पहुंचा पाई हैं। यानी उत्पादन की लागत तेजी से बढ़ी लेकिन तैयार सामान के दाम उतनी तेजी से नहीं बढ़े।

कैसे कम हो जाती है Value Addition?

GDP में मैन्युफैक्चरिंग का आकलन केवल बिक्री के आधार पर नहीं बल्कि Value Addition के आधार पर किया जाता है।

इसे समझाने के लिए गर्ग ने एक उदाहरण दिया। मान लीजिए किसी प्रोडक्ट की अंतिम कीमत 100 रुपये है और पहले उसे बनाने की इनपुट कॉस्ट 60 रुपये थी। ऐसे में कंपनी का Value Addition 40 रुपये होगा।

अगर इनपुट कॉस्ट बढ़कर 80 से 85 रुपये हो जाए लेकिन अंतिम कीमत 100 रुपये ही रहे तो मौजूदा कीमतों पर Value Addition केवल 15 से 20 रुपये रह जाएगा।

गर्ग ने कहा कि इसी अंतर के कारण मैन्युफैक्चरिंग में Current Prices पर Value Addition कम दिखाई दे सकता है और डिफ्लेटर नेगेटिव हो सकता है।

नेगेटिव डिफ्लेटर का मतलब कीमतों में गिरावट नहीं

सरकार की दलील है कि नेगेटिव डिफ्लेटर का मतलब यह नहीं है कि पूरे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कीमतें गिर रही हैं। इसके बजाय यह कंपनियों के मार्जिन पर पड़ रहे दबाव को दिखा सकता है।

इनपुट महंगे होने और आउटपुट कीमतें उसी अनुपात में नहीं बढ़ पाने से कंपनियों को बढ़ी हुई लागत का हिस्सा खुद उठाना पड़ता है।

India Inc के लिए क्या संकेत?

इस पूरी बहस का सीधा मतलब कॉरपोरेट इंडिया के लिए यह है कि उत्पादन और बिक्री की मात्रा मजबूत रहने के बावजूद मुनाफे पर दबाव आ सकता है। अगर कच्चे माल की लागत बिक्री कीमतों से ज्यादा तेजी से बढ़ती है तो कंपनियों का मार्जिन कम हो सकता है।

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GDP को लेकर सरकार का कहना है कि हाल के बदलाव नए बेस ईयर अपडेटेड डेटा सोर्स और बेहतर मेथडोलॉजी से जुड़े हैं। मैन्युफैक्चरिंग डिफ्लेटर की बहस भी इसी सवाल से जुड़ी है कि GDP के आंकड़ों और कंपनियों की जमीनी स्थिति को किस तरह समझा जाए।