1.1 अरब बैरल तेल गायब! IMF की चेतावनी; दुनिया का ऑयल मार्केट अब बड़े झटके के लिए कम तैयार
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की रुकावट के बावजूद ग्लोबल ऑयल मार्केट ने बड़े सप्लाई शॉक को संभाल लिया, लेकिन IMF ने अब नई चिंता जताई है। दुनिया ने स्टॉक, एक्स्ट्रा प्रोडक्शन और कम डिमांड के सहारे संकट टाला, मगर ये सेफ्टी बफर तेजी से घट रहे हैं।

In Short
- ◆ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की रुकावट से करीब 20 मिलियन बैरल प्रतिदिन की सप्लाई प्रभावित हुई
- ◆ मई के आखिर तक 1.1 अरब बैरल से ज्यादा क्रूड ग्लोबल मार्केट तक नहीं पहुंच पाया
- ◆ IMF ने चेताया कि ऑयल स्टॉक और स्पेयर प्रोडक्शन कैपेसिटी घटने से अगला शॉक ज्यादा भारी पड़ सकता है
दुनिया का ऑयल मार्केट पिछले कुछ महीनों में ऐसे बड़े सप्लाई संकट से गुजरा है, जो आम हालात में क्रूड ऑयल की कीमतों को बहुत ऊपर ले जा सकता था। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के लगभग बंद होने के बावजूद कीमतें शुरुआती उछाल के बाद 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास टिक गईं। लेकिन अब IMF का कहना है कि जिन वजहों से मार्केट ने यह झटका सह लिया, वही सेफ्टी बफर तेजी से कम हो रहे हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि बाजार अब तक कैसे संभला और आगे खतरा कहां है।
होर्मुज बंद होने से रुकी बड़ी सप्लाई
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के प्रभावी रूप से बंद होने के बाद करीब 20 मिलियन बैरल प्रतिदिन क्रूड और रिफाइंड प्रोडक्ट्स की सप्लाई प्रभावित हुई। यह दुनिया की कुल ऑयल खपत का करीब पांचवां हिस्सा है। सऊदी अरब ने रेड सी के यानबू तक अपनी पाइपलाइन का इस्तेमाल बढ़ाया और UAE ने फुजैराह एक्सपोर्ट फैसिलिटी को लगभग पूरी कैपेसिटी पर चलाया। फिर भी इन रास्तों से होर्मुज के जरिए जाने वाले तेल का केवल एक हिस्सा ही पूरा किया जा सका।
मई के आखिर तक 1.1 अरब बैरल की कमी
मई के अंत तक 1.1 अरब बैरल से ज्यादा क्रूड मार्केट तक नहीं पहुंच पाया। यह दुनिया की सामान्य खपत के करीब 10 दिनों के बराबर है। IMF के मुताबिक यह कमी 1973 के ऑयल शॉक, ईरान-इराक युद्ध और गल्फ वॉर के दौरान दर्ज सप्लाई शॉर्टफॉल से भी बड़ी थी। डीजल और जेट फ्यूल की सप्लाई पर भी असर पड़ा क्योंकि गल्फ देश इन प्रोडक्ट्स की ग्लोबल सप्लाई में करीब 10% हिस्सेदारी रखते हैं।
डिमांड घटी और दूसरे देशों ने बढ़ाया प्रोडक्शन
ऊंची कीमतों के बाद खासकर एशिया में कई कंज्यूमर्स और बिजनेस ने ऑयल की खपत कम की और कोयले तथा रिन्यूएबल एनर्जी जैसे विकल्पों की तरफ रुख किया। हालांकि ट्रांसपोर्ट सेक्टर में खपत कम करना मुश्किल रहा। इसी दौरान गल्फ के बाहर ऑयल प्रोडक्शन 2025 के मुकाबले करीब 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन बढ़ गया। अमेरिका ने इसमें सबसे बड़ा योगदान दिया जबकि वेनेजुएला, गुयाना और रूस ने भी अतिरिक्त सप्लाई दी।
ऑयल स्टॉक ने संभाला सबसे बड़ा झटका
मार्च से मई के बीच ग्लोबल ऑयल मार्केट में करीब 4 मिलियन बैरल प्रतिदिन का डेफिसिट रहा। इस कमी का लगभग पूरा हिस्सा ग्लोबल इन्वेंट्री से पूरा किया गया। इसमें चीन के कमर्शियल स्टॉक और स्ट्रैटेजिक रिजर्व भी शामिल थे। यानी सप्लाई संकट खत्म नहीं हुआ था, बल्कि पहले से जमा तेल निकालकर बाजार को चलाया गया।
अब कम हो रहे हैं सेफ्टी बफर
युद्ध से पहले ग्लोबल ऑयल सप्लाई डिमांड से करीब 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन ज्यादा थी। अब यह सरप्लस काफी हद तक खत्म हो चुका है। स्पेयर प्रोडक्शन कैपेसिटी इस्तेमाल हो रही है, डिमांड पहले ही एडजस्ट हो चुकी है और इन्वेंट्री भी लगातार घट रही है। यही IMF की सबसे बड़ी चिंता है।
होर्मुज खुलने के बाद भी तुरंत राहत नहीं
अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह खुल भी जाता है तो सामान्य ऑयल फ्लो वापस आने में दो से तीन महीने लग सकते हैं। शिपिंग अरेंजमेंट, इंश्योरेंस और ऑपरेटर्स का कॉन्फिडेंस दोबारा बनने में समय लगेगा। लंबे समय तक प्रोडक्शन बंद रहने पर कुछ ऑयल वेल्स को दोबारा चालू करना आर्थिक रूप से मुश्किल भी हो सकता है।
अगला झटका कीमतों को तेजी से चढ़ा सकता है
अगर इन्वेंट्री ऑपरेशनल मिनिमम के करीब पहुंच जाती है और इसी दौरान कोई नया बड़ा सप्लाई शॉक आता है तो इस बार असर ज्यादा तेज हो सकता है। कम स्टॉक और कम स्पेयर कैपेसिटी के कारण छोटी सप्लाई रुकावट भी क्रूड की कीमतों में बड़ा उछाल ला सकती है।
IMF ने दिए तीन बड़े सुझाव
IMF का कहना है कि देशों को स्ट्रैटेजिक और कमर्शियल ऑयल स्टॉक दोबारा भरने चाहिए। साथ ही होर्मुज जैसे एक ही चोकपॉइंट पर निर्भरता घटाकर दूसरे सप्लाई रूट और रिन्यूएबल एनर्जी के विकल्प बढ़ाने होंगे। कंज्यूमर्स को दी जाने वाली फ्यूल सब्सिडी और प्राइस सपोर्ट भी टारगेटेड और टेम्परेरी होनी चाहिए, ताकि सरकारी फाइनेंस पर ज्यादा दबाव न पड़े।

