GDP Deflator क्या है? CPI, WPI और PPI का आर्थिक विकास पर समझें असर
भारत की GDP ग्रोथ पर बहस अब CPI और WPI से आगे बढ़कर GDP Deflator और PPI तक पहुंच गई है। आखिर महंगाई का असर हटाकर Real Growth कैसे निकाली जाती है और Manufacturing में Input-Output Prices की गणना क्यों अहम है? सौरभ गर्ग ने पूरे तरीके को आसान उदाहरणों से समझाया है।

In Short
- GDP Deflator को सिर्फ WPI से समझना सही नहीं, Services के लिए CPI भी अहम
- Real GDP निकालने के लिए महंगाई के असर को हटाकर वास्तविक उत्पादन की ग्रोथ देखी जाती है
- Manufacturing में Input और Output Prices को अलग-अलग एडजस्ट करने में PPI और Value Added Methodology की अहम भूमिका
भारत की GDP ग्रोथ को लेकर चल रही बहस अब सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं है कि अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से बढ़ी। अब सवाल इस बात पर भी उठ रहे हैं कि महंगाई के असर को हटाकर असली यानी Real GDP Growth कैसे निकाली जाती है। बिजनेस टुडे के एक शो में ग्रुप एडिटर सिद्धार्थ ज़राबी के सवालों का जवाब देते हुए MoSPI सचिव सौरभ गर्ग ने कहा कि इस मुद्दे पर काफी भ्रम इसलिए है क्योंकि GDP Deflator की तुलना सीधे WPI या CPI के हेडलाइन आंकड़ों से की जा रही है।
Nominal GDP और Real GDP में क्या अंतर?
गर्ग ने समझाया कि GDP को Current Prices और Constant Prices दोनों पर मापा जाता है। Current Prices पर GDP में कीमतों में हुई बढ़ोतरी का असर भी शामिल होता है, जबकि Constant Prices का इस्तेमाल महंगाई का असर हटाकर असली उत्पादन में हुई बढ़ोतरी समझने के लिए किया जाता है।
उन्होंने इसे एक आसान उदाहरण से समझाया। मान लीजिए किसी अर्थव्यवस्था में लगातार दो साल 100 गाड़ियां बनती हैं। पहले साल एक गाड़ी की कीमत 100 रुपये थी और अगले साल बढ़कर 110 रुपये हो गई। ऐसे में उत्पादन का कुल मूल्य 10 फीसदी बढ़ जाएगा, लेकिन गाड़ियों की संख्या वही रहेगी। यानी Nominal Growth दिखेगी, लेकिन Real Growth नहीं होगी।
सिर्फ WPI से GDP Deflator क्यों नहीं समझा जा सकता?
गर्ग के मुताबिक GDP Deflator को समझने के लिए सिर्फ Wholesale Price Index यानी WPI देखना सही नहीं होगा। WPI मुख्य रूप से सामान यानी Goods की कीमतों पर फोकस करता है, जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था का करीब 55 फीसदी हिस्सा Services से आता है।
ऐसे सेक्टर्स में CPI यानी Consumer Price Index भी महत्वपूर्ण संकेतक हो सकता है। यही वजह है कि GDP की गणना में किसी एक महंगाई इंडेक्स का इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि अलग-अलग सेक्टर और गतिविधियों के हिसाब से कई Price Indicators को देखा जाता है।
PPI को क्यों माना जा रहा अहम?
सौरभ गर्ग ने Producer Price Index यानी PPI का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक भारत ने अब PPI तैयार करना और उसका इस्तेमाल शुरू किया है। उन्होंने इसे वैश्विक स्तर पर इस्तेमाल होने वाला बेहतर तरीका बताया।
इसके साथ Value Added Methodology के तहत Input Prices और Output Prices के असर को अलग-अलग एडजस्ट किया जाता है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलती है कि असल में किसी सेक्टर ने कितनी Value Add की।
Manufacturing में क्यों जरूरी है अलग गणना?
Manufacturing सेक्टर में यह अंतर खास तौर पर महत्वपूर्ण हो जाता है। अगर Raw Material की कीमत तेजी से बढ़ जाए लेकिन Final Product की कीमत उसी अनुपात में न बढ़े, तो कंपनी या सेक्टर की Value Addition घट सकती है।
ऐसी स्थिति में सिर्फ Final Output की कीमत देखकर Real Growth का सही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। इसलिए Input और Output दोनों की कीमतों से महंगाई का असर अलग-अलग हटाकर वास्तविक बढ़ोतरी निकाली जाती है।
GDP बहस में क्या है असली मुद्दा?
गर्ग के मुताबिक भारत की GDP को किसी एक Inflation Number के आधार पर सही या गलत नहीं ठहराया जा सकता। GDP Calculation में Sectoral Deflators, Value Added और अर्थव्यवस्था में Services की बड़ी हिस्सेदारी जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है।
यानी GDP Growth को समझने के लिए सिर्फ CPI या WPI के हेडलाइन आंकड़ों को देखना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे इस्तेमाल होने वाली विस्तृत Statistical Methodology को भी समझना जरूरी है।

