US-Iran युद्ध के बीच चावल महंगा, बासमती के दाम 20% और नॉन-बासमती 25% तक बढ़े
देश में चावल की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है। US-Iran युद्ध के बीच खाड़ी देशों की बढ़ी खरीद और दक्षिण भारत में कमजोर बारिश ने सप्लाई पर दबाव बढ़ाया है। बासमती चावल के दाम 15-20% और नॉन-बासमती के रेट 20-25% तक बढ़ गए हैं। कारोबारियों के मुताबिक नई फसल आने तक कीमतें ऊंची रह सकती हैं।

In Short
- बासमती चावल के दाम एक साल में 15-20% तक बढ़े।
- नॉन-बासमती चावल की कीमतों में 20-25% की तेजी आई।
- नई खरीफ फसल आने तक कीमतों में राहत मिलने की उम्मीद कम।
देश में चावल की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है। बासमती और नॉन-बासमती दोनों तरह के चावल के दाम बढ़ गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी बड़ी वजह US-Iran युद्ध के बीच वैश्विक स्तर पर खाद्य सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता और खाड़ी देशों की ओर से भारतीय चावल की ज्यादा खरीद है। वहीं, दक्षिण भारत में कमजोर बारिश ने घरेलू सप्लाई पर भी दबाव बढ़ाया है।
कारोबारियों के मुताबिक, बासमती चावल की कीमतें वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में पिछले साल की तुलना में 15-20% तक बढ़ गई हैं। वहीं, नॉन-बासमती चावल के दाम में 20-25% तक की तेजी आई है। बाजार से जुड़े लोगों का कहना है कि अक्टूबर-नवंबर में नई खरीफ फसल आने तक कीमतों में बड़ी राहत की उम्मीद कम है।
खाड़ी देशों की बढ़ी खरीद से बढ़ी मांग
RiceVilla ग्रुप के CEO सूरज अग्रवाल के मुताबिक, दुनिया के कई देश अपनी खाद्य आपूर्ति सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। चावल एक प्रमुख खाद्य पदार्थ है, इसलिए खाड़ी देशों की ओर से भारत से बड़ी मात्रा में खरीद की जा रही है।
इस बढ़ी मांग का असर बासमती चावल की कीमतों पर भी दिख रहा है। बासमती चावल, जिसका इस्तेमाल खास तौर पर बिरयानी और अन्य व्यंजनों में किया जाता है, की कीमत वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में करीब ₹100 प्रति किलो तक पहुंच गई है। पिछले साल इसी अवधि में यह करीब ₹85 प्रति किलो थी।
सोना मसूरी समेत नॉन-बासमती चावल भी महंगा
कीमतों में तेजी सिर्फ बासमती तक सीमित नहीं है। नॉन-बासमती चावल की कई किस्मों के दाम भी बढ़े हैं। सोना मसूरी चावल, जिसकी कीमत पिछले साल ₹51-52 प्रति किलो थी, अब बढ़कर ₹63-64 प्रति किलो तक पहुंच गई है।
कारोबारियों का कहना है कि बाजार में मांग मजबूत बनी हुई है, जबकि नई सप्लाई आने में अभी समय लगेगा। ऐसे में आने वाले कुछ महीनों तक चावल की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
निर्यात बाजार का भी असर
भारत से बासमती चावल के निर्यात में भी तेजी रही है। KRBL लिमिटेड के बल्क राइस एक्सपोर्ट प्रमुख अक्षय गुप्ता के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में भारत ने 154 देशों को रिकॉर्ड 6.52 मिलियन टन बासमती चावल भेजा है।
सऊदी अरब भारत के बासमती चावल का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है। पश्चिम एशिया से मांग लगातार बनी हुई है। हालांकि, खाड़ी क्षेत्र में भुगतान और शिपिंग से जुड़ी कुछ दिक्कतों के कारण सप्लाई प्रभावित हुई है।
कम बारिश और सरकारी खरीद का दबाव
घरेलू बाजार में भी कुछ कारणों से कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। Rice Exporters Association के अध्यक्ष बीवी कृष्णा राव के मुताबिक, सरकारी खरीद और दक्षिण भारत में कम बारिश ने बाजार पर दबाव बढ़ाया है।
आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में कम बारिश के कारण सप्लाई पर असर पड़ा है। वहीं, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के लिए सरकारी खरीद ने भी बाजार में उपलब्ध चावल की मात्रा को प्रभावित किया है।
फिलहाल कारोबारियों का मानना है कि चावल की कीमतों में बड़ी गिरावट नई खरीफ फसल आने, बारिश की स्थिति सुधरने और विदेशी मांग कम होने के बाद ही संभव है। तब तक आम लोगों के घरेलू बजट पर महंगे चावल का असर जारी रह सकता है।

