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कच्चा तेल 120 डॉलर पार, फिर भी भारत में कई देशों जितने क्यों नहीं बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम? समझिए पूरी रणनीति

कच्चे तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बावजूद भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम दुनिया के कई देशों जितने क्यों नहीं बढ़े? इसके पीछे सरकार, टैक्स कटौती और तेल कंपनियों की ऐसी रणनीति है, जिसने करोड़ों उपभोक्ताओं को राहत दी। लेकिन इसकी असली कीमत आखिर किसने चुकाई?

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AI Generated Image

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जारी भारी उतार-चढ़ाव के बीच भारत ने फ्यूल की दरों को कंट्रोल में रखने के लिए एक अलग नीति अपनाई है। रूस-यूक्रेन युद्ध और साल 2026 में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज संकट के दौरान ब्रेंट क्रूड कई बार 120 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया।

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इंडिया टुडे के रिपोर्टर हिमांशु मिश्रा की रिपोर्ट के मुताबिक जहां दुनिया के अधिकांश देशों ने इस बढ़ोतरी का पूरा बोझ सीधे जनता पर डाल दिया, वहीं भारतीय उपभोक्ताओं को सरकार और तेल कंपनियों की रणनीति से बड़ी राहत मिली। इसी कड़ी में करीब चार साल तक कीमतों को काबू में रखने के बाद 15 मई 2026 को पेट्रोल-डीजल के दामों में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई और आज 19 मई को तेल की कीमतों में 90 पैसे की बढ़ोतरी हुई है।

क्या रही सरकार की रणनीति?

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, केंद्र सरकार ने साल 2021 से 2026 के बीच चार बार एक्साइज ड्यूटी में बड़ी कटौती की है। इस दौरान नवंबर 2021 और मई 2022 में टैक्स कम किए गए।

इसके बाद मार्च 2024 और अप्रैल 2025 में भी जनता को राहत दी गई। सबसे बड़ा कदम 27 मार्च 2026 को उठाया गया, जब Special Additional Excise Duty (SAED) में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की गई और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी को लगभग शून्य कर दिया गया। इस टैक्स कटौती से सरकारी खजाने पर करीब 30,000 करोड़ रुपये का सीधा बोझ पड़ा।

2014 से तुलना करना ठीक या नहीं?

मौजूदा तेल नीति की तुलना साल 2014 से करना ठीक नहीं है। पहले की कम कीमतें वास्तव में तेल बांड के जरिए भविष्य पर डाला गया एक कर्ज था। साल 2005 से 2010 के बीच जारी हुए करीब 1.34 लाख करोड़ रुपये के तेल बांड का भुगतान वर्तमान सरकार को करना पड़ रहा है।

इसके उलट, इस बार सरकार ने बिना कोई बांड जारी किए राजस्व का नुकसान खुद उठाया है। होर्मुज संकट के समय पेट्रोल पर 24 रुपये और डीजल पर 30 रुपये प्रति लीटर तक का अंतर सरकार और तेल कंपनियों ने मिलकर झेला है। तेल कंपनियों ने 2021 से 2024 के बीच 24,500 करोड़ रुपये का घाटा सहा, जबकि एलपीजी उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए 40,000 करोड़ रुपये का बोझ उठाया गया।

वैश्विक बाजार की तुलना में भारत की स्थिति काफी बेहतर रही है। फरवरी से मई 2026 के बीच जब म्यांमार, पाकिस्तान और अमेरिका जैसे देशों में ईंधन के दाम 40 से 100 फीसदी तक बढ़ गए, तब भारत में यह बढ़ोतरी सिर्फ 4 फीसदी के आसपास सिमट कर रह गई।

देश के अंदर अलग-अलग राज्यों में कीमतों का यह अंतर वहां की राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले वैट (VAT) के कारण है। जहां आंध्र प्रदेश और केरल जैसे राज्यों में वैट 30 फीसदी से अधिक होने के कारण पेट्रोल 107 रुपये प्रति लीटर के पार है, वहीं उत्तर प्रदेश, गुजरात और दिल्ली जैसे राज्यों में कम वैट के कारण कीमतें 97 रुपये या उससे नीचे बनी हुई हैं।

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