नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के पीछे क्या है असली वजह? उठ रहे ये 5 बड़े सवाल
नीतीश कुमार के अचानक से राज्यसभा जाने की इच्छा से लोगों में मन में कई सवाल आ रहे हैं। आज हम आपको ऐसे 5 सवालों के जवाब देंगे जो ज्यादातर लोगों के मन में उठ रहे हैं।

नीतीश कुमार की वजह से बिहार की राजनीति एक बार फिर से सुर्खियों में है। नीतीश कुमार ने आज अपने X अकाउंट पर पहले राज्यसभा जाने की इच्छा जताई और फिर राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन भी भर दिया।
उनके साथ भाजपा के रामनाथ ठाकुर, नितिन नवीन और शिवेश कुमार के साथ-साथ राष्ट्रीय लोक मोर्चा के उपेंद्र कुशवाहा ने भी अपना नामांकन भरा है। अमित शाह भी इस मौके पर पटना में मौजूद रहे।
नीतीश कुमार के अचानक से राज्यसभा जाने की इच्छा से लोगों में मन में कई सवाल आ रहे हैं। आज हम आपको ऐसे 5 सवालों के जवाब देंगे जो ज्यादातर लोगों के मन में उठ रहे हैं।
पहला सवाल- क्या अपने बेटे के लिए छोड़ी नीतीश कुमार ने बिहार की कुर्सी?
बिहार की सत्ता को छोड़कर राज्यसभा जाना नीतीश कुमार के राजनीतिक करियर में काफी महत्वपूर्ण मोड़ है। सूत्रों की मानें तो 75 वर्षीय नीतीश कुमार उम्र और स्वास्थ्य कारणों के चलते राजनीति से दूरी बना रहे हैं, जिससे भाजपा को मुख्यमंत्री पद देने का रास्ता साफ हो जाता है।
पहले माना जा रहा था कि नीतीश कुमार की जगह उनके बेटे निशांत राज्यसभा के लिए नामांकन भरेंगे, जबकि ऐसा माना जा रहा है कि उन्हें उप मुख्यमंत्री का पद मिल सकता है। कुछ लोगों को लग सकता है कि अपनी कुर्सी छोड़कर नीतीश अपने बेटे को राजनीति में स्थापित करना चाहते हैं, पर यह कहना सही नहीं होगा। नीतीश खुद परिवारवाद के खिलाफ काफी आक्रामक रहे हैं। अगर वह चाहते तो मुख्यमंत्री रहते हुए भी अपने बेटे को मंत्रिमंडल में शामिल कर सकते थे।
दूसरा सवाल- नीतीश कुमार के वोट बैंक का क्या होगा?
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने से उनका अपने वोट बैंक पर प्रभाव कम हो सकता है। उनके वोट बैंक में मुख्य तौर पर कुर्मी-कोईरी (लव-कुश), अति पिछड़ा वर्ग (EBC), महादलित और महिलाएं जैसी कैटेगरी शामिल हैं। लेकिन अगर उनके बेटे निशांत उप मुख्यमंत्री बन जाते हैं तो ऐसे में यह वोट बैंक पार्टी के साथ ही रह सकता है।
नीतीश ने अपने कार्यकाल के दौरान EBC जैसे वर्गों के लिए कई कदम उठाए थे जिनका उनकी छवि पर पॉजिटिव असर देखने को मिला है। अब माना जा रहा है कि भाजपा इन दलों को अपनी तरफ खींचने का प्रयास करेगी, खासकर सवर्ण और दलितों को। नीतीश के बिहार की राजनीति से दूर जाने के बाद उनके इस वोट बैंक को अपनी तरफ करने के लिए भाजपा, राजद और कांग्रेस सभी लगे हुए हैं। लेकिन जिस तरह से भाजपा नीतीश को अपने साथ लेकर चल रही है उससे ऐसा लगता है कि उनके वोट बैंक को अपनी तरफ करने में भाजपा सफल हो सकती है।
तीसरा सवाल- JDU का क्या होगा?
नीतीश कुमार जद(यू) के स्टार नेता हैं। ऐसे में उनका पार्टी से दूर जाने से पार्टी में नेतृत्व का संकट आ सकता है। नीतीश के रहते पार्टी में कोई दूसरा बड़ा नेता उभरकर सामने नहीं आया। उनके बाद पार्टी के पास ऐसा कोई नेता नहीं है जो नीतीश कुमार की बराबरी कर सके। ऐसे में अब जद(यू) के नेताओं के पास यही विकल्प है कि या तो भाजपा की छाया में रहें या फिर भाजपा में शामिल हो जाएं।
लेकिन अगर किसी तरह निशांत मुख्यमंत्री बन जाते हैं तो ऐसे में कुछ समय के लिए पार्टी उनके ऊपर एकजुट रह सकती है। पार्टी के वरिष्ठ नेता जैसे संजय झा कुछ समय तक काम संभाल सकते हैं, लेकिन भविष्य के लिए कोई मजबूत नेतृत्व नजर नहीं आता है। अगर भविष्य में जद(यू) का भाजपा में विलय हो जाए तो यह चौंकाने वाली बात नहीं होगी। जो लगातार EBC और कुर्मी-कोईरी वोट बैंक को साधने में लगी हुई है।
चौथा सवाल- नीतीश को सीएम पद छोड़कर क्या मिलेगा?
नीतीश कुमार ने कुछ ही महीने पहले हुए चुनाव को जीतकर बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं। ऐसे में यह सवाल सबके सामने है कि राज्यसभा जाने से उन्हें क्या हासिल होगा। अक्सर नेता अपनी कुर्सी छोड़ने का नाम नहीं लेते, चाहे उन्हें जेल ही क्यों न हो जाए, लेकिन नीतीश कुमार के साथ ऐसा कुछ नहीं है।
ऐसा हो सकता है कि भविष्य में उन्हें कोई संवैधानिक पद मिल सकता हो। देश में जैसी राजनीति चल रही है उसके हिसाब से उन्हें भविष्य में राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति तो नहीं बनाया जा सकता है। लेकिन शायद उन्हें केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है या फिर किसी राज्य का राज्यपाल भी बनाया जा सकता है।
पांचवा सवाल- क्या किसी ने नीतीश पर बनाया दबाव?
नीतीश के राज्यसभा जाने के फैसले को उनकी अपनी मर्जी बताया जा रहा है। लेकिन कई लोगों से यह बात हजम नहीं हो रही है। भाजपा पर अक्सर इल्जाम लगता रहा है कि वह अपनी सहयोगी पार्टियों के वोट बैंक को अपना बना लेती है और छोटी पार्टियों को कमजोर कर देती है। बिहार के चुनाव में भाजपा और जद(यू) दोनों साथ मिलकर लड़े थे। इस बार 2025 के चुनाव में दोनों ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें भाजपा ने 89 और जद(यू) ने 85 सीटें जीतीं।

